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हाँ! मैं भारत माता हूँ

आचार्य संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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‘मैं भारत माता हूँ…’
आर्यावर्त की जननी,
इतिहास की गर्जना
कृष्ण की तर्जनी,
रघुनंदन की तरिणी
भव-भय तारिणी,
‘मैं भारत माता हूँ!’

‘मैं भारत माता हूँ…’
हिमालय की चोटी हूँ,
जम्बू-द्वीप में सोती हूँ
कश्मीर में रोती हूँ,
पंजाब की खेती हूँ
कन्याकुमारी तक जागती हूँ,
‘मैं भारत माता हूँ!’

‘मैं भारत माता हूँ…’
मेरी छाती में बहती निर्मल धारा,
गंगा, यमुना, सरस्वती, कावेरी
गोदावरी, नर्मदा, सोन, कोसी,
ब्रह्मपुत्र, दामोदर की धारा
भेड़ाघाट, डल झील, रिहंद, भाखड़ा-नांगल,
सरदार सरोवर-सब हैं श्रृंगार मेरा,
‘मैं भारत माता हूँ!’

‘मैं भारत माता हूँ…’
मुगलों ने सदियों सताया,
अंग्रेजों ने खूब थर्राया
गुलामी में मुझे तड़पाया,
मेरे वीर पुत्रों ने मुझे बचाया
हँसते-हँसते फांसी को गले लगाया,
तब जाकर आजादी का दिन आया,
‘मैं भारत माता हूँ!’

‘मैं भारत माता हूँ…’
मेरी छाती लहू-लुहान है,
शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, रणजीत सिंह के शौर्य से
बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, खुदीराम बोस के बलिदान से
भगत, आजाद, बिस्मिल, अशफाक, सुखदेव, राजगुरु के लहू से,
मंगल पांडेय, लक्ष्मीबाई, कुंवर सिंह, तात्या टोपे के तेज से
लाला, बाल, पाल और वीर अब्दुल हमीद से,
नेताजी और लाखों गुमनाम शहीदों के खून से
‘मैं भारत माता हूँ!’

‘मैं भारत माता हूँ…’
आज मैं स्वच्छंद, आजाद हूँ,
मेरे शेर सैनिकों पर मुझे नाज है
मेरी उर्वर धरती सोना अनाज उगाती है,
लाल किले पर तिरंगा ही मेरा ताज है
महादेव-महाकाल ही मेरे सरताज हैं,
विश्वगुरु होने का मुझमें आज भी राज है,
‘मैं भारत माता हूँ!’

‘मैं भारत माता हूँ…’
वेद, पुराण, रामायण, गीता, महाभारत मेरा ज्ञान है
न्याय और धर्म-युद्ध से भरा मेरा इतिहास महान है,
बुद्ध और गांधी का शांति संदेश मेरी पहचान है
सनातन संस्कृति का शाश्वत उपदेश मेरी वाणी है,
केसरिया-भगवा अनादि से मेरा परिधान है
साधु-संत, आचार्य-शंकराचार्य मेरे ही संतान हैं,
‘मैं भारत माता हूँ!’

‘मैं भारत माता हूँ…’
मेरी आँखों के सामने हिमालय, कंचनजंघा, नंदा देवी, त्रिशूल, विंध्याचल, अरावली, सतपुड़ा, नीलगिरि, अन्नामलाई, सह्याद्रि
ये पर्वत मालाएं ही मेरी हरियाली और खुशहाली की प्रेरणा हैं
‘मैं भारत माता हूँ!’

‘हाँ, मैं ही भारत माता हूँ…’
अशोक चक्र से सजा मेरा भाल है,
विशाल भारत ही मेरी ढाल है
मैं ही महाकाली, मैं ही महाकाल हूँ,
राम मेरे, कृष्ण मेरे, हनुमान मेरा ही कपाल हैं
यह धरती मेरी जलती हुई मशाल है,
‘मैं ही भारत माता हूँ!’

‘मैं भारत माता हूँ…’
खुश हूँ कि आज तुम तिरंगा फहराओगे,
खुशी मनाओगे, मिठाइयाँ बाँटोगे
पर फिर भी मैं बहुत दुखी हूँ,
सोचती हूँ, कल फिर वही करोगे ?
अपराध, हत्या, लूट, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी,
मुनाफाखोरी, शिक्षा में कदाचार फिर अपनाओगे ?
जियो और जीने दो, सत्य, अहिंसा, अनुशासन कब अपनाओगे ?
कब इस कलंक के भार से मुझे मुक्त कराओगे ?,
‘हाँ! मैं भारत माता हूँ… हाँ! मैं ही भारत माता हूँ…॥

परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे आचार्य संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएस-सी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता व रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुम्बई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़े हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत,  कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। सम्मान-पुरस्कार में आपको महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ  कवि सम्मान-२०२३ सहित अन्य मिले हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार करना है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज-पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”