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हिंदी:भाषा-प्रयोगशाला बनाई जाए

प्रो.डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला(मध्यप्रदेश)

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भारत की आत्मा ‘हिंदी’ व हमारी दिनचर्या….

“हिंदी में तो शान है,हिंदी में है आन।
हिंदी में क्षमता भरी,हिंदी में है मान॥
हिंदी में है नम्रता,किंचित नहीं अभाव।
नवल ताज़गी संग ले,बढ़ता सतत प्रभाव॥”

हिंदी एक ऐसी भाषा है जो आसानी से हर वर्ग को समझ आती है। हिंदी के विकास के लिए हमें सरकारी और गैर-सरकारी कार्यालयों में हिंदी को प्रोत्साहित करना होगा। हिंदी की किताबों को महत्व देना होगा। जहां भी सुविधा मौजूद है, सरकारी कार्यालयों में प्रार्थना-पत्र या दरख्वास्त हिंदी में लिखें। हिंदी वालों को चाहिए कि वह अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी अपना पता लिखें। अपने घरों,दफ्तरों पर नाम की तख्तियां हिंदी में लगाएं। कार्यालयों में हिंदी का उपयोग हो,बैंक आदि में पैसा निकलवाते या चैक देते वक्त हिंदी का प्रयोग करें,सभी बस-स्थानकों और बसों,रेलवे स्टेशनों,नगर निगमों,कार्यालयों,तहसीलों और स्वास्थ्य केंद्रों के अलावा अन्य सभी जगह बोर्ड हिंदी में होने चाहिए। इन सुझावों के अलावा अन्य और इस तरह के आम सुझावों पर ध्यान दिया जा सकता है।
हिंदी-प्रयोग के दायरे को फैलाने के लिए हमें उसे घर-घर पहुंचना चाहिए,हिंदी पढ़नी चाहिए और हिंदी लिखनी चाहिए,एक आंदोलन के तौर पर लोगों से संपर्क करना चाहिए। वाट्सएप या फेसबुक पर हिंदी का प्रयोग करें। सरकारी स्तर पर हिंदी के विकास के लिए भाषा-प्रयोगशाला बनाई जाए। हिंदी को सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के रोजगार से जोड़ना भी आवश्यक है,ताकि नई पीढ़ी अपने भविष्य को रोशन कर सके।
जिन विद्यालयों,महाविद्यालयों में हिंदी के छात्रों की संख्या कम हो रही है,उनके शिक्षकों को आस-पास के क्षेत्रों में हिंदी के लिए अभियान चलाना चाहिए। आज के सूचना प्रौद्योगिकी युग में हमें यह भी आंकलन करना चाहिए कि क्या प्राथमिक विद्यालयों में दी जा रही शिक्षा वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी के लिहाज से परिपूर्ण है ? इसलिए हिंदी के पाठ्यक्रम को सूचना प्रौद्योगिकी आधारित बनाया जाना चाहिए। हिंदी सॉफ्टवेयर के विकास में काम करें,क्योंकि अगर वर्तमान तेजी के युग में वह इसमें पीछे रह गई तो पिछड़ जाएगी। हिंदी के विकास में लगे हुए सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों को एक मंच पर आकर वर्ष में कम से कम एक बार हिंदी की चुनौतियों और मुश्किलों पर चर्चा करनी चाहिए,उनको हल करने की कोशिश करनी चाहिए। रिक्त पड़े हिंदी पदों को केन्द्रीय व राज्य सरकारों को तुरंत भरना चाहिए। बेहतर हिंदी शिक्षकों और उसके सेवकों को पुरस्कार-सम्मान देना चाहिए।
हम कह सकते हैं कि २१वीं सदी में हिंदी की स्थिति को देखते हुए कुछ जिम्मेदारियां हमारी भी बनती हैं,क्योंकि हिंदी भाषा के विकास के लिए दूसरों की प्रतीक्षा करने या किसी दिव्य शक्ति की प्रतीक्षा करने की जगह,आप जो भी कर सकते हैं, अकेले या समूह के आकार में करें। इन जिम्मेदारियों को लागू करना हमारा पहला कर्तव्य होना चाहिए। आशा है कि हालात और बेहतर होंगे। इन्हीं अंधेरों से सूरज निकलेगा,और हिंदी को उसका आधिकारिक स्थान मिलेगा-
हिंदी नित आगे बढ़े,यही आज अरमान।
हिंदी का उत्थान हो,यही फले वरदान।
हिंदी का अभिषेक हो,जो देती उजियार।
हिंदी का विस्तार हो,जो हरती अँधियार॥

परिचय-प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे का वर्तमान बसेरा मंडला(मप्र) में है,जबकि स्थायी निवास ज़िला-अशोक नगर में हैL आपका जन्म १९६१ में २५ सितम्बर को ग्राम प्राणपुर(चन्देरी,ज़िला-अशोक नगर, मप्र)में हुआ हैL एम.ए.(इतिहास,प्रावीण्यताधारी), एल-एल.बी सहित पी-एच.डी.(इतिहास)तक शिक्षित डॉ. खरे शासकीय सेवा (प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष)में हैंL करीब चार दशकों में देश के पांच सौ से अधिक प्रकाशनों व विशेषांकों में दस हज़ार से अधिक रचनाएं प्रकाशित हुई हैंL गद्य-पद्य में कुल १७ कृतियां आपके खाते में हैंL साहित्यिक गतिविधि देखें तो आपकी रचनाओं का रेडियो(३८ बार), भोपाल दूरदर्शन (६ बार)सहित कई टी.वी. चैनल से प्रसारण हुआ है। ९ कृतियों व ८ पत्रिकाओं(विशेषांकों)का सम्पादन कर चुके डॉ. खरे सुपरिचित मंचीय हास्य-व्यंग्य  कवि तथा संयोजक,संचालक के साथ ही शोध निदेशक,विषय विशेषज्ञ और कई महाविद्यालयों में अध्ययन मंडल के सदस्य रहे हैं। आप एम.ए. की पुस्तकों के लेखक के साथ ही १२५ से अधिक कृतियों में प्राक्कथन -भूमिका का लेखन तथा २५० से अधिक कृतियों की समीक्षा का लेखन कर चुके हैंL  राष्ट्रीय शोध संगोष्ठियों में १५० से अधिक शोध पत्रों की प्रस्तुति एवं सम्मेलनों-समारोहों में ३०० से ज्यादा व्याख्यान आदि भी आपके नाम है। सम्मान-अलंकरण-प्रशस्ति पत्र के निमित्त लगभग सभी राज्यों में ६०० से अधिक सारस्वत सम्मान-अवार्ड-अभिनंदन आपकी उपलब्धि है,जिसमें प्रमुख म.प्र. साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार(निबंध-५१० ००)है।

 

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