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हिंदी! तुम सदा रहो हिंदुस्तानी

शशि दीपक कपूर
मुंबई (महाराष्ट्र)
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हिंदी और हमारी जिंदगी…

हिंदी हम भारतीय नागरिकों की जीवनदायिनी है। लगभग पूरे भारत में हर जाति, धर्म व प्रदेश के लोग हिंदी जानते हैं और समझते हैं। भावों, मनोभावों और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति में स्वयं को आरामदायक भी अनुभव करते हैं, लेकिन हिंदी को प्रचार-प्रसार की आवश्यकता ही क्यों पड़ी ? यह प्रश्न हिंदीभाषी के मस्तिष्क में आघात करता है, क्योंकि हमारे देश की अपनी ‘राष्ट्रीय भाषा’ ही नहीं है। ‘राष्ट्रभाषा’ का विकल्प ‘राजभाषा’के रूप में सरकारी तरफ से संरक्षण दिए हुए है। वास्तव में, राजभाषा का यह संरक्षण भारतीय कार्यालयों में सिर्फ १४ सित़बर ‘हिंदी दिवस’ पर नींद से सोए हुए शेरों को जगाने का कार्य करता है। गोष्ठी, कहानी, कविता व मनोरंजन, कार्यालयी शब्दों का ज्ञान इत्यादि के संबंध में प्रतियोगिता आयोजित की जाती है और खान-पान व्यवस्था का भी प्रबंध किया जाता है। कुछ शेर सिर्फ भोजन करते हैं और हिंदी के बारे कुछ ऐसे विचार प्रस्तुति करते हैं, जैसे-
हिंदी का अनुमान-
“क्या आप हिंदी जानते हैं ?” चितकबरी आँखों से बुरी तरह से घूर कर पूछा।
“आज तापमान अति गर्म है!”, उत्तर दिया गया। ‌
“क्या आप हिंदी जानते हैं ?” फिर उसने सिर्फ़ सपाट आँखों से देखा।
“आज तापमान में नमी है!”, उतर मिला।
“क्या आप हिंदी जानते हैं ?” झुकी आँखों ने पूछा।
“आज धूप खिलेगी।” उत्तर की आँखें प्रश्न से मिल गईं।

घंटी-
फोन की घंटी बजी..ट्रिंग..ट्रिंग..ट्रिंग…।
फोन उठाया, कान पर लगाते ही आवाज आई,-“मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ ?”
वहां से झुंझलाई आवाज आई,-“मुझे हिंदी नहीं आती।”
“महाशय, तो फिर अभी किस भाषा में उत्तर दे रहे थे ?”
उसने कहा,-“जी, काम-चलाऊ भाषा में।”

समझा जा सकता है कि, हिंदी भाषा कहने को जीवंत है, किन्तु अपमान के साथ भी जीने में गर्व महसूस कराती है। यथा-
‘उर्दू सीख लूट-कूट करने लगे,
अंग्रेजी सीख रग-रग में फैली बेईमानी
हाय! अब मैं क्या करूं!
हिंदी नहीं देती दाना-पानी।’
कहने का तात्पर्य है कि, साहित्य क्षेत्र व व्यावहारिक क्षेत्र में हिंदी अपनी ही मस्त चाल से चली आ रही है। अन्य भाषाओं के शब्दों व अर्थ को ज्यों का त्यों ग्रहण कर भाषा शब्दकोश में वृद्धि कर रही है।
भविष्य में वही हाल, डाल के दो पात, यानि जैसे समय परिवर्तन के अनुसार बोल-चाल में संस्कृत लुप्त हो गई, अपभ्रंश और पाली गुम हो गईं और अवधी या ब्रजभाषा बोल-चाल तक सीमित हो गई…! हो सकता है, आने वाली तीन-चार पीढ़ियों के बाद हिंदी का भविष्य असुरक्षित हो जाए, क्योंकि आजकल हिंदी में देवनागरी लिपि की बजाए अंग्रेजी लिपि का बढ़ता प्रचलन सेंध लगा ही रहा है। अंग्रेजी शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग भी हिंदी शब्दकोश को एक तरफ खिसकाए जा रहा है।
इतना सब हिंदी संघर्ष होने के बावजूद भी धैर्य न त्यज्ते हुए कहना अतिश्योक्ति न होगी-
‘संस्कृत माँ शारदे है हिंदी की जननी,
नदी हिंदी गाती सब भाषाओं की कहानी।
सीखो भाषाएं उतनी सीख सको जितनी,
रखो सदा तन-मन से मातृभूमि हिंदुस्तानी॥’

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