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उपासना के साथ स्वयं को संस्कारित करें

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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नवरात्र में हम सभी पूजा-पाठ बहुत साफ-सुथरे ढंग से करते हैं। सभी प्रकार के सामान की व्यवस्था करते हैं एवं माँ की उपासना में खुद को डुबो देते हैं। माँ जगदम्बा के नौ रूपों से वातावरण खुशनुमा हो जाता है, चारों तरफ घर-मंदिर से माँ के मंत्र गूंजते हैं, लेकिन उपासना का महत्व केवल बाहरी कर्मकांड तक स्थिर नहीं रहता। यह अंतःकरण को शुद्ध कर हमें प्रभु के सान्निध्य के योग्य बनाता है।
        हम अक्सर सोचते हैं कि लोग पूजा क्यों करते हैं और क्या पूजा सार्थक हो पाती है ? देखा जाए तो अधिकांश लोगों की उपासना-मंत्र एक औपचारिकता बनकर रह जाती है, वह जीवन की आवश्यकताओं और चुनौतियों से जूझ नहीं पाती।
वास्तव में, उपासना का वास्तविक स्वरूप आत्म-शुद्धि और अंतःकरण की निर्मलता से जुड़ा होता है। उपासना, साधना, पूजा सभी मनुष्य के भीतर जागरूकता और अनुशासन का संचार करती है। ऋषि-मुनियों ने उपासना को मूलाधार बनाया था।
तो इस नवरात्र अपने भीतर जागरूकता, अनुशासन और अच्छे विचारों का संचार करें। प्रतिदिन माँ दुर्गा के नौ रूपों की उपासना के साथ अपने को आत्म-निरीक्षण, साधना और तप से संस्कारित करें।
उपासना को केवल कर्मकांड न बनाकर जीवन-शैली बनाएं, अपने भीतर इसे एक बदलाव का अनुष्ठान मानकर पूजा करें।
  उपासना के प्रसाद से प्राप्त शांति, करुणा, विवेक और साहस ही वे गुण हैं, जो हमें जीवन के संघर्षों में स्थिर रहने और सत्य मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करते हैं। सच्ची उपासना यही है। जय माँ भवानी!