डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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आम्र-मंजरी डाल-डाल पर, ऋतुराज का मधुमास रे
पीताभ कुसुमों में बिखर, प्रकृति-सुन्दरी का हास रे।
मंद पवन के मृदुल झकोरे, चहुँ सुगंध-सुधा बरसाते
भ्रमर प्रणय के गीत सुनाकर, मन वीणा झंकृत कर जाते।
कोमल गुच्छों में मुस्काता, नवजीवन का अनुराग रे
मधु ऋतु के आँचल में पलता, सृष्टि-सृजन का राग रे।
पल्लव-पल्लव हरीतिमा में, वन स्वर्णिम आभा छाई
आम्र-मंजरी ने धरती पर, मधुमयी छटा सुहाग रे।
कोयल की कुहुकों में गूँजे, प्रणय-प्रीत का गान रे
महुआ, पलाश, आम्र-सुगंधित, महके सकल जहान रे।
मंजरियों के मधुर पराग में, नित मधुमक्खी का श्रम,
प्रकृति सिखाती कर्म-साधना, जीवन का अनुपम मर्म रे।
आम्र-मंजरी आशा बनकर, नव उल्लास जगाती रे,
सूनी डालों पर भी आकर, स्वर्णिम स्वप्न सजाती रे।
फल बनकर जब प्रेम पकेगा, रस तृप्त करेंगे प्राण,
प्रकृति-प्रेम की इस कविता को, अर्पित शत सम्मान रे॥
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥