नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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वेदना के तार को तुम,
मत ही छेड़ो बार-बार
घायल हो जाते हैं,
मेरे प्राण बार-बार।
सोई हुई है वेदना,
जो लुप्त हो चुकी है दिल में
गड़े मुर्दे उखाड़ने से,
क्या होगा फायदा तुम्हें ?
रूह कांप जाती है,
जब याद आती है
कितनी हृदय बातें,
वो दहशत भरी रातें
वो तड़पती आहें।
जब अपने ही,
नजर आने लगे बेगाने
रह-रह कर,
वह जाती बातें।
सुनना नहीं किसी की बातें,
क्या सच है-क्या झूठ ?
इस जग में पल-पल,
बदलते हैं रूप।
दुनिया की फुन-फुन बातें,
क्या मिला तुम्हें सता के !
वेदना के तार को तुम,
मत ही छेड़ो बार-बार।
घायल हो जाते हैं,
मेरे प्राण बार-बार॥