पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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सारी रात मूसलाधार बारिश ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। बादल की भयंकर गर्जना और बिजली की चमक के कारण रात में कई बार चौंक कर मानसी उठ बैठी थी। सुबह ही उसको नींद लगी थी। सुबह के ६ बजे थे। हल्का-हल्का उजियारा होना शुरू ही हुआ था।
मौसम थोड़ा ठंडा भी हो रहा था। उसने चादर जोर से लपेट ली थी। आज इतवार भी था, इसलिए वह आराम से उनींदीं-सी लेटी थी। आज उसकी बाई भी देर से आएगी, इसलिए उसे उठने की कोई जल्दी नहीं थी। तभी गेट पर खट-खट की आवाज सुनते ही, वह चौकन्नी हो गई। इतनी बारिश में भला कौन आ सकता है! वह सोच ही रही थी, कि फिर दुबारा गेट खटकने की आवाज से वह एकदम उठ कर खिड़की से झांक कर देखने लगी कि इतनी बारिश में गेट कौन खट-खटा रहा है ?
वह चौंक पड़ी थी। उसकी कामवाली सहायिका सरस्वती एक फटी-सी नीली पन्नी सिर पर डाले हुए गेट से चिपकी खड़ी थी।
उसने पहले छाता लिया, फिर गेट का ताला खोल दिया था।
“क्या हुआ सरस्वती, इतनी सुबह– सुबह आ गई। आज तो सन्डे भी है। सब ठीक तो है…?“
”जी दीदी, माफ करिएगा। सारी रात मेरे कोठरी में पानी टपकता रहा। इसलिए पूरी रात कभी इस कोने, तो कभी उस कोने में बैठ करके किसी तरह रात काटी। थोड़ा-सा उजाला होता देखते ही मैं अपने काम पर निकल पड़ी और आपके घर आ गई। मुझे मालूम नहीं था, कि आपके गेट पर भी ताला लगा होता है, तो नहीं आती। आप लोगों को नाहक सुबह-सुबह जगा कर परेशान कर दिया।“
“कोई बात नहीं सरस्वती, पहले चाय बना लो। हम दोनों बैठ कर चाय पीते हैं। फिर थोड़ी देर आराम करके काम शुरू करना।“
“सुनो, ड्राइंगरूम में कालीन पर लेट जाना।“
“हमने सोचा, आपका काम करूँगी और फिर थोड़ी देर आपके वरांडे में कमर सीधी करके जरा-सी झपकी ले लूँगीं।
“दीदी, आप लोगों के घर पर जितनी देर रहूँगीं मेरे सिर पर छत से पानी तो नहीं टपकेगा।“
मानसी सोचने लगी, बारिश किसी के लिए सुखद और किसी के लिए मुश्किल खड़ी कर देती है।