कुल पृष्ठ दर्शन :

स्वार्थी होती ज़िन्दगी

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
*********************************************

स्वार्थी होती जा रही है आज सभी की ज़िन्दगी,
माता-पिता साथ नहीं रहते, फिर भी प्रेम की कमी
अकेले-अकेले रह रहे हैं लोग सभी,
फिर भी रिश्तों की डोर टूटती जा रही है कहीं।

हाय-हाय में डूबा है हर इंसान,
स्वार्थ के पीछे भाग रहा है सारा जहान
कमाते बहुत हैं, फिर भी संतोष नहीं,
असंतोष बढ़ता जाता है, मन को विश्राम नहीं।

हर कोई स्वयं को महान समझता है,
दूसरों से बेहतर होने का अभिमान रखता है
गाँवों से दूर होकर शहरों में बस गए सभी,
नौकरी के सहारे ही चल रही है ज़िन्दगी।

कमाते बहुत हैं, फिर भी ऋण का सहारा है,
मानो कर्ज़ पर टिका जीवन सारा है
घर, गाड़ी और सामान सब लोन पर खरीदते हैं,
किस्तों के बोझ तले सपनों को सींचते हैं।

सोशल मीडिया पर जी रहे हैं सभी,
ऑनलाइन सुविधाओं के आदी हो गए हैं सभी
घर बैठे हर सामान मँगाया जाता है,
बाज़ार जाने का मन भी अब कहाँ रह जाता है।

मोबाइल के सहारे कटता है दिन और रात,
उसी में सिमट गई है जीवन की हर बात
मिलना-जुलना और बातचीत होती कम,
आभासी दुनिया में खो गया है अपनापन।

घर में भी संवाद मोबाइल के माध्यम से होता है,
हर चेहरा अपनी ही दुनिया में खोता है
आज की ज़िन्दगी भागम-भाग से भरी हुई है,
एक क्षण का चैन भी मानो दूर कहीं है।

वर्क फ्रॉम होम में दिन बीत जाते हैं,
बैठे-बैठे लोग बीमारियाँ भी बुलाते हैं
घर में रहकर भी किसी से बात नहीं होती,
नज़रें केवल लैपटॉप की स्क्रीन पर ही होतीं।

कब ऑफिस से कोई संदेश आ जाए,
इस चिंता में मन हर पल घबराए
इसलिए हर समय सतर्क रहना पड़ता है,
व्यस्त जीवन का बोझ निरंतर बढ़ता है।

किसी को किसी के लिए फुरसत नहीं है,
आज की ज़िन्दगी सचमुच सरल नहीं है
हर व्यक्ति अपनी ही दुनिया में खोया है,
दूसरों के दुःख-सुख से रिश्ता भी कम हो गया है।

ऐसी विषम परिस्थिति में मन को शांति नहीं आती,
चिंताओं के कारण रातों को नींद नहीं आती।
यही है आज की ज़िन्दगी की सच्ची कहानी,
भागदौड़, व्यस्तता और अकेलेपन की निशानी॥