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पत्तों की सरसराहट

संजय वर्मा ‘दृष्टि’ 
मनावर (मध्यप्रदेश)
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ये कौन-सी आवाज है,
जो जानी-पहचानी सी लगती।

हवा से पेड़ों के पत्ते की सरसराहट,
कोयल की कूक में
दब-सी जाती वो आवाज,
जो जानी-पहचानी सी लगती।

तालाब में खिले कमल,
लगते ऐसे जैसे किसी ने
पैरों में महावर लगाई हो
सूरज के उदय होने की लालिमा,
जैसे बादल ने अपना रंग बदला हो।

मैं इन फिजाओं में तुम्हें ढूंढता,
मगर ना तुम दिखाई देती
और ना ही तुम्हारी आवाज,
जो जानी-पहचानी सी लगती।

लगता एक स्वप्न-सा देखा,
वो आवाज तो बरसों पहले ही।
हवा के साथ बह गई थी,
बस अब पत्तों की बची है सरसराहट॥

परिचय-संजय वर्मा का साहित्यिक नाम ‘दॄष्टि’ है। २ मई १९६२ को उज्जैन में जन्मे श्री वर्मा का स्थाई बसेरा मनावर जिला-धार (म.प्र.) है। भाषा ज्ञान हिंदी और अंग्रेजी का रखते हैं। आपकी शिक्षा हायर सेकंडरी और आयटीआय है। कार्यक्षेत्र-नौकरी ( मानचित्रकार के पद पर सरकारी सेवा) है। सामाजिक गतिविधि के तहत समाज की गतिविधियों में सक्रिय हैं। लेखन विधा-गीत, दोहा, हायकु, लघुकथा, कहानी, उपन्यास, पिरामिड, कविता, अतुकांत, लेख, पत्र लेखन आदि है। काव्य संग्रह-दरवाजे पर दस्तक, साँझा उपन्यास-खट्टे-मीठे रिश्ते (कनाडा), साझा कहानी संग्रह-सुनो, तुम झूठ तो नहीं बोल रहे हो और लगभग २०० साँझा काव्य संग्रह में आपकी रचनाएँ हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में भी निरंतर ३८ साल से रचनाएँ छप रहीं हैं। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में देश-प्रदेश-विदेश (कनाडा) की विभिन्न संस्थाओं से करीब ५० सम्मान मिले हैं। ब्लॉग पर भी लिखने वाले संजय वर्मा की विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्तर पर मिले सम्मान हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-मातृभाषा हिन्दी के संग साहित्य को बढ़ावा देना है। आपके पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद,तो प्रेरणा पुंज-कबीर दास हैं। विशेषज्ञता-पत्र लेखन में है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-देश में हिंदी को पूर्ण बढ़ावा मिले, बेरोजगारी की समस्या दूर हो, महंगाई भी कम हो, महिलाओं पर बलात्कार, उत्पीड़न, शोषण आदि पर अंकुश लगे और महिलाओं का सम्मान हो।