ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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मेरी असली प्रेरणा…..
पिता पर हमें गर्व होता है,
पिता ही तो सर्वस्व होता है।
पिता की डांट, पिता की मार,
यही तो उनका प्यार होता है।
जिस तरह एक कुम्हार बर्तन को,
बाहर-भीतर से पीट रहा होता है
पिताजी बनाते हैं हमें सामाजिक,
कुम्हार तो घड़ा बना रहा होता है।
पिताजी रोज सुबह-सवेरे उठ जाते हैं,
पूजा-पाठ फिर रोज कार्यालय जाते हैं।
घर आते समय कुछ भी खाने को लाते हैं,
दिनभर का फिर हाल सुनते और सुनाते हैं।
पिताजी हमें रोज विद्यालय भेजते हैं,
और कभी-कभार सिनेमा ले जाते हैं।
पिताजी हमारे साथ खूब खेलते हैं,
औेर पिताजी हमें प्यार भी करते हैं।
पिताजी हमारा पूरा ख्याल रखते हैं,
हम भाई-बहन भी उनका आदर करते हैं।
पूरे परिवार की जिम्मेदारी पिता पर होती है,
बच्चों की पढ़ाई और सबकी चिंता होती है।
पिताजी अपना फर्ज तो खूब निभाते हैं,
हम सब उनकी छत्र-छाया में सुरक्षित रहते हैं॥