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प्रकृति में काव्य और कलाएं समाहित

संगोष्ठी….

मंडला (मप्र)।

मानव और प्रकृति का संबंध अत्यंत प्राचीन है। प्रकृति में काव्य और सभी कलाएँ समाहित हो जाती हैं। अज्ञेय द्वारा संपादित ‘रूपांबरा संग्रह’ में प्रकृति और काव्य की अत्यंत सुंदर व्याख्या मिलती है।
      यह बात रजा स्मृति समारोह में ‘साहित्य और प्रकृति’ विषय पर हुई संगोष्ठी में देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों और आलोचकों ने साहित्य व प्रकृति के पारस्परिक संबंधों पर गंभीर विचार व्यक्त करते हुए कही।

   संगोष्ठी का संचालन करते हुए ध्रुव शुक्ल ने कहा कि जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और अज्ञेय की कविताओं के उदाहरण देते हुए उनके साहित्य में प्रकृति के विविध रूपों पर बिंदुवार टिप्पणी की।
    विवेक निराला ने कबीर से लेकर आधुनिक हिंदी साहित्य तक प्रकृति चित्रण की परंपरा पर प्रकाश डाला। अज्ञेय के संदर्भ में उन्होंने कहा कि कालिदास के यहाँ प्रकृति मानवीय भावों की संवाहक बनकर उपस्थित होती है। उन्होंने अज्ञेय की कृतियों ‘कतकी पूनो’, ‘बावरा अहेरी’ तथा ‘हरी घास पर क्षण’ भर का उल्लेख किया। सुमन केसरी ने कि खांडव वन का श्राप पूरे महाभारत में फलित होता है। उन्होंने भारतीय और यूनानी साहित्य में प्रकृति के सर्वव्यापी  प्रभाव की चर्चा करते हुए मेघदूत और ग्रीक मिथक परसेफोनी का उल्लेख किया।
     सदानंद साही ने रामचंद्र शुक्ल के हवाले से वाल्मीकि और कालिदास के साहित्य में प्रकृति के आलंबन रूप का स्मरण किया। अष्टभुजा शुक्ल ने भी साहित्य और प्रकृति के संबंध पर विचार व्यक्त किए।
   समापन वक्तव्य में वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि भारत में आधुनिकता के साथ प्रकृत्ति को देखने का दृष्टिकोण भी बदला है। उन्होंने विज्ञान द्वारा प्रकृति के रहस्यों के उद्घाटन का उल्लेख करते हुए मुक्तिबोध की प्रसिद्ध पक्ति ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ का संदर्भ दिया। कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने कहा कि कविता मनुष्य के विलाप से जन्मी है।
   आयोजन में मशहूर चित्रकार अखिलेश जी, साहित्यकार मनोहर जी, संपादक रंजीता सिंह, पूनम अरोड़ा, कवि-अनुवादक सुधा तिवारी एवं प्रियंका सिन्हा आदि ने शिरकत की।