डॉ. विद्या ‘सौम्य’
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
************************************************
‘कर्फ्यू’ सिर्फ शहर में ही नहीं लगते,
अक्सर लगा दिए जाते हैं…
अघोषित, मौन और अनगिनत बंदिशों के साथ
स्त्री की देह और देहरी के बीच।
कर्फ्यू…
रूह की गहराइयों में बुना एक ऐसा जाल,
जहां खामोश निगाहों के पहरे भी
सड़क के सन्नाटों से ज्यादा गहरे होते हैं
जहां सपनों के उगने से पहले ही,
दफन कर दिए जाते हैं,
मूक संवेदनाओं की अनगिनत पुकार…..।
कर्फ्यू…
खामोश दर्द के समंदर में तैरती, सुलगती,
एक धीमी-सी आग है…
जहां बिना किसी किनारे की उम्मीद में क़ैद,
एक स्त्री…
रेत से बनी दीवारों के बीच,
लफ़्ज़ों को उकेरती, सजाती, रंग भरती
अपनी थकी हुई हथेलियों की लकीरों से,
लिखती-मिटाती इबारत की एक नई दास्तां…।
कर्फ्यू…
बाहर शहर की रहनुमाई में लगा,
स्त्री के आँचल का एक अंगार है…
जहां सायरन की चीखें और बंद दरवाजों के, बीच थमी…
उसकी साँसों की सिसकियों की गूंज,
घूंघट और खामोशियों की ओट में भी
रिवाजों और रूढ़ियों के बाज़ार में खड़े,
अनगिनत बैरियर को तोड़ती भर लेती है
उन्मुक्त, बेमिसाल परिंदों-सी ऊँची उड़ान।
कर्फ्यू…
सिर्फ शहर में ही नहीं लगते।
अक्सर लगा दिए जाते हैं…
स्त्री के मान, सम्मान और स्वाभिमान पर॥