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बाल-मनोविज्ञान को समझते हुए साहित्य का सृजन करें-सिद्धेश्वर

​पटना (बिहार)।

आज अधिकांश बाल कविताएँ छंदबद्ध एवं गेय रूप में लिखी जा रही हैं। मुक्तछंद की बाल कविताएँ अपेक्षाकृत कम दिखाई देती हैं। इसका प्रमुख कारण बच्चों की स्वाभाविक रुचि है, जो आज भी लयात्मक और गेय रचनाओं की ओर अधिक आकर्षित होती है। बाल साहित्यकारों एवं कवियों के लिए आवश्यक है, कि वे बाल-मनोविज्ञान को समझते हुए बच्चों की रुचियों, आवश्यकताओं और संवेदनाओं के अनुरूप साहित्य का सृजन करें।
  साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘सिद्धेश्वर की डायरी’ के ६०१ वें अंक में संयोजक सिद्धेश्वर ने उपर्युक्त विचार व्यक्त किए।
  ​अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ लेखिका अनिता रश्मि ने कहा, कि बच्चे सभ्य समाज की नींव हैं। आज बाल साहित्य की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। नींव मजबूत होगी, तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और देश भी मजबूत होगा।
​उन्होंने सिद्धेश्वर द्वारा ली गई भेंट-वार्ता में कहा कि आज का बचपन बाल पत्रिकाओं से दूर होता जा रहा है। इसके लिए काफी हद तक अभिभावक भी जिम्मेदार हैं। वे अब घरों में बाल पत्रिकाएँ नहीं लाते, बल्कि बच्चों को मोबाइल थमा कर उन्हें बहलाने, शांत रखने तथा आधुनिक बनाने का प्रयास करते हैं।
 आयोजन में कवयित्री राज प्रिया रानी ने कविता और सिद्धेश्वर ने अपनी मार्मिक कथा ‘हम होंगे कामयाब’ का पाठ किया।
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