कुल पृष्ठ दर्शन : 3

न‌यी पीढ़ी को रावणों और पूतनाओं को पहचानने की आवश्यकता-डॉ. दवे

विमोचन…

इंदौर (मप्र)।

मूल सन्दर्भों से काटकर पौराणिक चरित्रों को व्यक्त करना वास्तविक लेखन नहीं है। लेखिका ने अपनी तीनों कृतियों में इन्हें अक्षुण्ण बनाए रखा है। न‌यी पीढ़ी को आज समाज में रावणों, कंसों और पूतनाओं आदि को  पहचानने की आवश्यकता है।
      वामा साहित्य मंच के बैनर तले इंदु पाराशर की ३ पुस्तकों का लोकार्पण श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति में करते हुए यह बात कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे साहित्य अकादमी मप्र के निदेशक डॉ. विकास दवे ने कही।

 मंच की प्रचार प्रमुख सपना साहू ‘स्वप्निल’ ने बताया कि अमर चड्ढा द्वारा प्रस्तुत ‌सुमधुर सरस्वती वंदना से आरंभ हुए कार्यक्रम में संस्था प्रमुख ज्योति जैन ने सभी का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इन कृतियों में भारतीय संस्कृति की सुगंध मौजूद है, जो पाठक को अभिभूत करने की क्षमता रखती है।
  इंदु पाराशर ने कहा कि तकलीफ में माता, पिता और ईश्वर ही याद आते हैं। घनीभूत पीड़ा के क्षणों में ही इन कृतियों की रचना हुई। राम-कृष्ण जैसे महान चरित्रों को लिखा नहीं जाता, वे तो भीतर गहरे तक उतरते हैं।
  चर्चाकार डॉ. गोपाल माहेश्वरी ने कहा कि ‘श्री कृष्ण बाल लीलायनम’ के ३१ अध्यायों में मिश्री मिले माखन-सा मधुर काव्य मौजूद है। पद्यों में यत्र – तत्र, सर्वत्र, काव्य गुण, शब्द शक्तियाँ और काव्यालंकार प्रकट हुए हैं।
डॉ. माला ठाकुर ने ‘संस्कृति सुरभि’ को एक ऐसा काव्य संग्रह बताया, जिसमें नवरसों का सम्मिश्रण निहित है।
अंतरा करवड़े ने पुस्तक ‘राम वीथिका’ पर अपनी बात रखते हुए कहा कि पुस्तक सार्थक शीर्षक के साथ पात्रों के संग पाठक को अयोध्या, मिथिला आदि स्थानों के गलियारों से गुजरने की प्रतीति करवाती है। लेखिका ने राम के चरित्र को पूरी ईमानदारी के साथ रेखाचित्र के रूप में प्रस्तुत किया है।
    डॉ. मनीष चौहान व डॉ  रागिनी सिंह ने डॉ. दवे, डॉ. पंकज पाराशर व पंखुरी पाराशर ने डॉ. गोपाल माहेश्वरी और डॉ. अंकिता पाराशर आदि ने स्वागत किया।
   सुगठित संचालन पद्मा राजेन्द्र ने किया। आभार डॉ. पंकज पाराशर ने प्रकट किया।