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बुजुर्ग की चिता से आधुनिक समाज के लिए उठते सवाल

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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आज के समय में हम सबने सुख- सुविधाओं के पहाड़ खड़े कर लिए हैं, परंतु रिश्तों की पूँजी घटा दी है। हमारे पास मँहगे फोन हैं, लेकिन माँ-बाप से बात करने के लिए समय नहीं है।
   बड़े-बुजुर्गों का कहना था, कि घर की सबसे बड़ी दौलत आँगन में साथ में बैठी पीढ़ियाँ होती हैं। हमारे यहाँ दादा-दादी, नाना-नानी की कहानियाँ, माता-पिता, भाई-बहनों का साथ और बच्चों की किलकारियों से ही परिवार पूरा होता था। किसी के भी बीमार होने पर पूरा परिवार उसके सिरहाने बैठ कर हाल-चाल लेता और मदद भी करता था। आज जब हमारे हाथ में मोबाइल है, जिससे हम पूरी दुनिया से जुड़ सकते हैं, तो भी हम परिवार और रिश्तों से दूर होते जा रहे हैं ।
हाल ही में हरियाणा के सोनीपत का बहुप्रसारित वीडियो रिश्तों की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल ख़ड़े करता है। ३ बेटियों के पिता का वृद्धाश्रम में बुढ़ापा बिताना कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि आजकल वृद्ध भी किसी के साथ रहने की अपेक्षा वृद्धाश्रम में रहना ज्यादा अच्छा समझते हैं, पर जिस पिता ने बेटियों को नाजों से पाला, पढ़ाया और उनका घर बसाया, वही जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपनों के सहारे से वंचित रह गए। बेटियाँ अंतिम दर्शन के लिए भी नहीं पहुँची। वृद्धाश्रम संचालकों ने बेटियों से संपर्क करके पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने का आग्रह किया, लेकिन कोई बेटी नहीं आई।
सबसे दर्दनाक और झकझोरने वाली बात यह है कि एक बेटी ने पैसे भेज कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली। और जब पिता की चिता जल रही थी तो वीडियोकॉल पर जलती चिता देख कर वह पूछती है, कि इसमें कितना समय लगेगा…? सोनीपत की यह घटना एक परिवार की कहानी नहीं, वरन् वह आईना है, जिसमें हम सभी को अपने रिश्तों का चेहरा देखना चाहिए।
ऐसी घटनाएं हमें सोचने को मजबूर करती हैं कि आखिर रिश्तों में दरार कहाँ से आई ? क्या ऑनलाइन पैसे भेज देना, उस बेटे-बेटी की भरपाई कर सकता है, जिसकी जरूरत अंतिम समय में होती है। यह घटना पूरे समाज की तस्वीर नहीं है और ना ही हर बेटा-बेटी ऐसा है। आज भी देश में असंख्य बच्चे अपने माँ- बाप की सेवा करना अपना सौभाग्य मानते हैं, लेकिन आजकल घटने वाली कुछ घटनाएं यह दर्शाती हैं कि रिश्तों के बीच में असामान्य दरार उपज रही है, जिसे समय रहते भरना जरूरी है।
  कुछ दिनों पहले जयपुर के सांगानेर में बुजुर्ग के बेटे ने उन्हें बुरी तरह से पीटा, जिसका वीडियो बहु प्रसारित हुआ था। इसी तरह जयपुर के ही प्रतापनगर में संपत्ति और सरकारी नौकरी के लालच में एक बेटी ने अपनी माँ की हत्या करवा डाली। यह समझना मुश्किल है, कि आखिर कौन-सी मानसिकता है ? जिन माता-पिता को कभी देवतुल्य मान कर पूज्य माना जाता था,
वही आज स्वार्थ और संपत्ति के लालच में बोझ लगने लगे हैं।
भारतीय संस्कृति में ‘मातृदेवो भवः पितृदेवो भवः’ केवल कहने के लिए नहीं था। माता-पिता बच्चों के जीवन की पहली पाठशाला हैं। उन्होंने हमें बोलना-चलना सिखाया, गिर जाने पर फिर से उठना सिखाया, जीवन में कठिनाइयों से लड़ना सिखाया, पर वही वृद्ध होने पर जब हमारे हाथ का सहारा चाहते हैं, तो हम उनके लिए समय निकालना कठिन समझने लगते हैं।
पहले संयुक्त परिवार हमारी ताकत होते थे। धीरे-धीरे शहरों की ओर पलायन, बदलती जीवन-शैली, कैरियर की मजबूरियाँ, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आर्थिक परिस्थितियों ने परिवार की संरचना बदली।
हमारे पास शानदार घर है, लेकिन बुजुर्गों के लिए जगह और धैर्य कम होता जा रहा है।
हमारी संस्कृति तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम् की है, अर्थात पूरा विश्व एक परिवार है। उसी समाज में अपने माता-पिता ही अकेले बेसहारा हो जाएँ तो यह विषय निश्चित रूप से आत्मंथन का होना चाहिए। आज की सबसे बड़ी जरूरत है, कि हम अपने बच्चों को रिश्तों की महत्ता के विषय में समझाएँ। हमें यह समझने की जरूरत है, कि हमारे बच्चे हमारी बातों से ज्यादा हमारे व्यवहार को याद करते हैं। यदि हम अपने बुजुर्ग का सम्मान करते हैं, उनके लिए समय निकालते हैं, उनके कठिन समय में उनको सहारा देते हैं तो निश्चय ही उनके भीतर भी बुजुर्गों के प्रति सम्मान का संस्कार जड़ें जमा लेगा।
   सोनीपत के उस बुजुर्ग की चिता अब बुझ चुकी है। समय के साथ यह घटना भी खबरों की भीड़ में खो जाएगी, लेकिन चिता की आग हमारे लिए प्रश्न छोड़ गई है कि क्या हम वास्तव में इतने व्यस्त हैं कि पिता की चिता जल जाने तक का भी हमारे पास समय नहीं है ?
किसी भी समाज की असली ताकत उसकी संस्कृति, संस्कार और संवेदनाएं होती हैं। रिश्ते हमें विरासत में जरूर मिलते हैं, लेकिन उन्हें जीवित रखने के लिए हर पीढी को प्रयास करना पड़ता है।
अपने सपनों को अवश्य पूरा करिए, लेकिन माँ-बाप के साथ बैठिए, उनके साथ मुस्कुराइए, उनकी बातें सुनिए, क्योंकि जीवन में सब कुछ दोबारा मिल जाएगा, लेकिन माता-पिता का साथ और उनके साथ बिताया समय दुबारा नहीं मिलेगा।