राधा गोयल
नई दिल्ली
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हमें कई बार वैष्णो देवी जाने का मौका मिला। दर्शन के पश्चात सात कन्याओं को पूजने के बाद भोजन करवाया जाता है। हर बार मैंने देखा कि दुकान वाला चुपचाप आकर उन लड़कियों से हलवा-पूरी ले जाता था, केवल पैसे लड़कियों के पास रह जाते थे। लड़कियों की अलग-अलग २-३ पालियाँ बनी हुई थीं। आरती के हॉल में जहाँ लोग बैठे होते हैं, वहीं पर एक ऊँचा चबूतरा था जिस पर कन्याएँ सोई हुई थीं। एक बार मैंने देखा कि कोई कन्याओं को जगा रहा था कि उठो अब तुम्हारी बारी है। सात कन्या वहाँ से उठीं। इससे अनुमान लगा कि उनकी ड्यूटी आठ-आठ घंटे की होती होगी। एक बार तो यह कहने के बावजूद भी, कि हलुआ-पूरी यहीं बैठकर हमारे सामने खाना है, उन लड़कियों ने हाँ कह दिया, लेकिन दुकानदार आया… हलवा-पूरी के दोने उनके हाथ से लिए… पैसे लड़कियों ने निकाल लिए… हलवा- पूरी दोबारा बिकने के लिए चला गया।
लोगों की आस्था के साथ इस तरह खिलवाड़ करना क्या अच्छी बात है, कि आस्था ही खत्म हो जाए। वैसे भी मेरा मानना है, कि हम पत्थर की मूरत को तो पूजते हैं लेकिन घर में चाहे माँ हो… बहन हो… पत्नी हो या बेटी… उनको जो मान सम्मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता। बेहतर है, घर की औरतों का सम्मान करो। माँ-बहनों का सम्मान करो, वही असली पूजा है। कन्याओं को कोख में मत मारो।
आज लिंगानुपात की दर बहुत तेजी से बढ़ रही है। अभी खबर आई थी कि बागपत में एक बहू को सभी भाइयों की पत्नी बनने के लिए मजबूर किया गया। यदि लड़के लड़कियों में इसी तरह लिंगानुपात की दर में कमी आती रही तो वह दिन दूर नहीं, जब हालात इससे भी बदतर हो जाएंगे। पुरुषों से अधिक महिलाओं को जागरूक होना पड़ेगा, कि वे अपने बच्चों में शुरू से ऐसे संस्कार डालें कि वे औरतों का सम्मान करना सीखें। स्त्रियाँ स्वयं भी अपनी इस दकियानूसी सोच से बाहर निकलें कि पुत्र का होना बहुत जरूरी है। मुखाग्नि कौन देगा ? बुढ़ापे में कौन सहारा देगा ? आज सभी देख रहे हैं, कि कितने लड़के माँ-बाप के बुढ़ापे का सहारा बने हुए हैं ? बुढ़ापे में माँ-बाप अकेले रहने को विवश हैं। जरूरत है, कि घर की औरतों को मान दिया जाए। उन्हीं को साक्षात देवी का रूप समझा जाए। जब दिल से स्वीकार करोगे तो हर औरत में देवी का रूप ही नजर आएगा। जिस दिन ऐसा हो जायेगा, उस दिन स्वर्ग धरा पर उतर आएगा। वही असली कन्या पूजन होगा।