कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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ज़िंदगी का नाम दोस्ती… (मित्रता दिवस विशेष)…
चलो मन, आसमान में,
आसमान से कुछ मिट्टी लाऊँ
मिट्टी लाकर एक अपना मित्र बनाऊँ,
मित्र जो प्यारा हो, दिल से मेरा अपना हो।
रास न आए झूठा जग,
कहाँ कम होता गम बात करके
गम को कहाँ कोई कम कर पाता,
थक चुकी झूठे संसार से।
कौन दिल से सुनता वेदना को,
कहाँ दिखता किसी को दर्द किसी का
छुपाती चलूँ हर वेदना अपनी,
क्या करूँ झूठी संवेदना लेकर!
वह चेहरा तो अपना होगा,
अपने हाथों का प्यारा दोस्त होगा
सुन लेगा मेरे सारे गम को वह,
सच्चा होगा, न करेगा झूठा वादा।
वादा करके न मुँह मोड़ लेगा, न करेगा अपमान मेरा वह,
भरी सभा में न दिखलाएगा मेरी वेदनाओं को
मेरी प्रेम की हर कहानी को रख लेगा वह सीने में,
मेरे नाम का वह मित्र, मेरा प्यारा अपना होगा।
जगत के हर इंसान से डरता मन,
मेरी मिट्टी की मूरत, तुम मेरे हो
जगत से डरता है मन सदा,
यह जीवन भाग रहा आपा-धापी में।
बैठ जाऊँ कुछ देर अपने मित्र के पास,
जो अपना है, कहाँ अब अपने हैं
जिस दिन बनाई दोस्त की मूरत,
मेरा दोस्त मिट्टी का, सदा मेरा है,
भुलावे में सब लगे हैं जग में।
डरी-सहमी, हक्की-बक्की, सब भौंचक्के,
मेरा मित्र प्यारा लगता, मिट्टी का।
कुछ देर मन की सारी बातें कर लेती दोस्त से,
मेरा है जो समझे मन को, मेरा प्यारा मिट्टी का मित्र॥