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रिश्वत के महल और भ्रष्ट व्यवस्था

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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अब हर तरफ देखो, तो सिर्फ धन-धन की झंकार सुनाई देती है, क्योंकि भ्रष्ट लोगों का खेल-तमाशा इतना आधुनिक हो गया है। काले को सफ़ेद करने में जरा-सी भी देर नहीं लगती है। इस तमाशे को देखते तो सब लोग हैं, लेकिन इस जहां में इस पर बोलता कोई नहीं है। दबी जुबान में जरूर कहे देते हैं, -‘दुनिया बड़ी खराब है।”अब देखो हर तरफ ऑनलाईन का इतना जोर हो गया है, कि एक पानी की बोतल भी घर में मांगने हेतु लोग आर्डर दे देते हैं, तो रिश्वत के गड़बड़झाले के लिए यही प्रयोग योग्य हो चुका है। टेबल के नीचे से लेने की आदत अब पुरानी हो चुकी है। मनी-मनी अपना सपना, दूसरे के हिस्से में भी ट्रांसफर किए जा रहे हैं, क्योंकि लेना तो हमारा काम है, देने वाले तो ऊपर वाले हैं, भगवान। हम तो सिर्फ कर्म कर रहे हैं। देखने वाले तो कहते हैं, -“फलां-फलां अफसर बहुत ईमानदार है, देखो कितनी मेहनत से इतना बड़ा ‘महल’ खड़ा कर लिया।” यही तो अंदर की बात है भाई…? काले कारनामे करने वाले आज-कल बहुत अच्छे तरीके से आँखों में से काजल चुरा लेते हैं। उनके गोरख धंधे रिश्वत के बीज तो थोड़े-थोड़े हर जगह डाल ही गए हैं, इसलिए हरियाली इतनी हो जाती है, कि कड़क नोटों को सब देखते रह जाते हैं। उनके इस खेल के खिलाड़ी या मोहरे इतने हैं कि हर जगह ऐसे आत्मयोग जो कम समय में ज्यादा खाने की लालच में लगे रहते हैं, उन्हें तो सिर्फ अपना ही पेट भरना है। वह चाहे जैसे भी हो काला-पीला किया जाएं।
   आज भ्रष्टाचार ऐसा वृटवक्ष बन चुका है, कि इसकी हर एक शाख पर उल्लू बैठे हुए हैं। इसमें अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन्हें हम विशालकाय गिद्ध कहें, क्योंकि जब पैसे का बैग दिखाई देता है तो वहां सभी नजरें गड़ाए हुए बैठे भ्रष्टाचारी गिद्ध अपनी चोंच में पकड़ने के लिए आगे बढ़ते हुए दिखाई देते हैं। ऐसा लगता है कि जंगलराज में वही शिकारी बने हुए हैं, क्योंकि राजा को तो प्रजा की चिंता ही कहाँ है! नये-नये तरीकों से वह पैसे वाला बैग अपना बनाने हेतु प्रतीक्षा में ही रहते हैं। आमजन, जिन्हें अपना सब-कुछ मानते हैं, वहीं आँखों में मिर्ची डालने में पीछे नहीं रहते हैं। उन्हें तो अपना पेट भरने से मतलब है, दुनिया जाए कहीं भी, उन्हें क्या करना है ? रिश्वतखोरों के पैसे से  चाहें महल, बिल्डिंग और बड़े-बड़े बंगले बना लिए हो, और इसमें रहने वाले यहाँ लोग चाहे अपने-आपको कितना भी पाक-साफ बताएं, पर ‘ये पब्लिक है सब जानती है।’
उन लोगों का भ्रष्ट तंत्र, जो मौन रह कर काम तमाम कर रहे हैं, वह सबसे ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि उन लोगों की भूख खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। आज-कल की लचर व्यवस्था या लालची लोगों को कोसने वाले भी भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बन चुके हैं। आखिर कब तक हम रोना ही रोते रहेंगे, इस चुप्पी से क्या फायदा ? हमारी कमजोरी है, कि हम आवाज उठाने से डरते हैं, या फिर हम सभी भी इसी रंग में रंगे जा रहे हैं।