ललित गर्ग
दिल्ली
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भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका मतदाता है और मतदाता की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पहचान उसका मताधिकार है। इसलिए मतदाता सूची केवल नामों का प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है। जिस व्यक्ति का नाम पात्र होते हुए मतदाता सूची में नहीं है, उसकी लोकतांत्रिक भागीदारी अधूरी रह जाती है और जिस व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी हो, जो स्थानांतरित हो गया हो अथवा जिसका नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज हो, उसका नाम सूची में बने रहना चुनाव की विश्वसनीयता पर प्रश्न है। इसी दृष्टि से मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया है। इसकी सफलता केवल गलत या अपात्र नाम हटाने से नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम सुरक्षित रखने और छूटे हुए मतदाताओं को वापस जोड़ने से तय होगी। निर्वाचन आयोग ने २०२६ में एसआईआर की प्रक्रिया को कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक विस्तारित किया है। आयोग के कार्यक्रम में घर-घर जाकर सत्यापन, प्रारूप मतदाता सूची का प्रकाशन, दावे और आपत्तियां लेने तथा अंतिम सूची प्रकाशित करने जैसी प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि २७ मई २०२६ को सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार में किए गए एसआईआर की वैधानिकता को बरकरार रखा और माना कि आयोग को संविधान के अनुच्छेद ३२४ तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के संबंधित प्रावधानों के तहत ऐसी प्रक्रिया संचालित करने का अधिकार है।
एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और सामाजिक बहस पैदा हुई है, लेकिन बेवजह चुनाव आयोग एवं मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर विवाद खड़े किए जाने की स्थितियाँ विडम्बनापूर्ण है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार ९ राज्यों और ३ केंद्रशासित प्रदेशों की संयुक्त मतदाता सूची में एसआईआर के बाद १०.२ प्रतिशत की कमी हुई और ६६,८८, ६३६ मृत मतदाताओं के नाम हटाए गए। इसी प्रक्रिया में आपत्तियों के बाद ६३.१६ लाख नाम भी हटाए गए। इन आँकड़ों को केवल एक राजनीतिक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। इनमें परिवर्तन यह बताता है कि मतदाता सूची को नियमित रूप से अद्यतन करते रहना कितना आवश्यक है। यहीं से इस पूरी प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी सामने आती है। यदि किसी अपात्र व्यक्ति का नाम हटाना लोकतंत्र की शुचिता के लिए जरूरी है, तो किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से हट जाना भी उतनी ही गंभीर समस्या है। मतदाता सूची को शुद्ध करने और मतदाता अधिकार को सुरक्षित रखने के बीच संतुलन ही एसआईआर की वास्तविक सफलता है। इस दृष्टि से निर्वाचन आयोग का हालिया विशेष अभियान महत्वपूर्ण है। २ अक्टूबर को आयोग ने एसआईआर पूरी कर चुके राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में उन पात्र मतदाताओं को फिर से सूची में शामिल करने के लिए विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया, जिनके नाम पुनरीक्षण के दौरान छूट गए हों। लगभग एक महीने में अभियान पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। राजनीतिक दलों के बूथ स्तर एजेंटों के साथ संबंधित सूचियां साझा करने का निर्देश भी पारदर्शिता की दृष्टि से उल्लेखनीय है। यही वह बिंदु है, जहां सूची के पुनरीक्षण को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे ले जाने की आवश्यकता है। विपक्षी दलों ने एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं और कहा है कि इससे पात्र नागरिकों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर आयोग का कहना है कि उसका उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना है। इन दोनों पक्षों के बीच अंतिम निष्कर्ष राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि पारदर्शी आँकड़ों, दस्तावेजी प्रमाण, आपत्ति और अपील की प्रभावी व्यवस्था तथा स्वतंत्र जांच से निकलना चाहिए। किसी दल के आरोप को स्वतः सत्य मान लेना भी उचित नहीं है और किसी शिकायत को केवल राजनीतिक आरोप कहकर खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
भारतीय लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग की संवैधानिक भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना उसी जिम्मेदारी का अनिवार्य हिस्सा है। आयोग के डिजिटल पोर्टल पर मतदाता अपना नाम खोज सकते हैं और शिकायत भी दर्ज कर सकते हैं। यह व्यवस्था नागरिकों को केवल प्रशासन पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं अपने मतदाता अधिकार की जांच करने का अवसर देती है, पर केवल तकनीक पर्याप्त नहीं है। भारत की सामाजिक और भौगोलिक विविधता को देखते हुए ऐसे नागरिक भी हैं, जिनके पास डिजिटल साधनों की सीमित पहुंच है। आयोग ने विशेष अभियान के अंतर्गत बूथ स्तर के शिविरों तथा रात के आश्रयस्थलों, श्रमिक बस्तियों, बेघर और अन्य वंचित समूहों के लिए विशेष शिविरों का निर्देश भी दिया है। यही दृष्टिकोण मतदाता सूची को केवल कागजी शुद्धता से आगे बढ़ाकर वास्तविक लोकतांत्रिक समावेशन से जोड़ता है।
यह भी समझना होगा कि मतदाता सूची में सुधार कोई एक बार होने वाला अभियान नहीं हो सकता। शहरों में तेजी से बढ़ता प्रवास, गांवों से पलायन, निवास परिवर्तन, १८ वर्ष की आयु पूरी करना, मृत्यु और एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण होते रहते हैं, इसलिए आयोग स्वयं मतदाता पंजीकरण को सतत प्रक्रिया मानता है। वास्तविक चुनौती यह है कि पुनरीक्षण के दौरान हटे हुए प्रत्येक नाम के पीछे एक नागरिक हो सकता है। इसलिए हर हटाए गए नाम को संदेह की दृष्टि से देखना और हर शिकायत को गंभीरता से सुनना आवश्यक है। इसी तरह हर पुराने नाम को केवल इसलिए बनाए रखना भी उचित नहीं होगा कि वह पहले सूची में था। लोकतंत्र में मतदाता सूची का सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए-न पात्र व्यक्ति छूटे और न अपात्र व्यक्ति मतदान व्यवस्था में बना रहे।
लोकतंत्र की मजबूती का अर्थ केवल अधिक मतदान प्रतिशत नहीं है। उसका अर्थ यह भी है कि जो पात्र नागरिक मतदान करना चाहता है, उसे मतदाता सूची में स्थान मिले, जो व्यक्ति मतदान के योग्य नहीं है, उसका नाम नियमपूर्वक हटे, शिकायत करने वाले को सुनवाई मिले और अंतिम निर्णय पारदर्शी प्रक्रिया से हो। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बिहार एसआईआर की वैधानिकता को स्वीकार किए जाने का अर्थ भी यही है कि मतदाता सूची की शुद्धता का संवैधानिक महत्व है, साथ ही प्रक्रिया में निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन आवश्यक है। इसलिए आज आवश्यकता एसआईआर के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने से अधिक महत्वपूर्ण उस प्रक्रिया को इतना पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की है कि किसी पात्र नागरिक को अपने मताधिकार के लिए संघर्ष न करना पड़े। भारतीय लोकतंत्र की शक्ति चुनाव कराने में ही नहीं, बल्कि हर योग्य नागरिक को चुनाव में भाग लेने का समान अवसर देने में है। मतदाता सूची का शुद्धीकरण लोकतंत्र की सफाई है, लेकिन उस सफाई में कोई निर्दोष नागरिक बाहर न रह जाए, इसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। एसआईआर तभी अपने व्यापक उद्देश्य को पूरा करेगा जब शुद्धता और समावेश, दोनों साथ चलें।