राधा गोयल
नई दिल्ली
************************************
कहने को तो आजाद हुए, पर मन से गुलामी गई नहीं,
खान-पान और रहन-सहन, भाषा तक अपनी रही नहीं
आजादी उच्छृंखलता की, आजादी नारेबाजी की,
आजादी है आन्दोलन की, आजादी चोरबाजारी की
आजादी गुण्डागर्दी की, आजादी आग लगाने की,
आजादी एक-दूसरे को, नजरों से सिर्फ गिराने की
बेकार के इन सब कामों में, कितना ही समय बर्बाद किया,
यदि इतनी चिंता कर लेते, सीमा के पहरेदारों की,
बेबस मजबूर किसानों की, और सैनिक के परिवारों की।
सीमा के प्रहरी के कारण, हम चैन से घर में रहते हैं,
वो हाड़ गलाती सर्दी में, सीमा पर चौकस रहते हैं
तपती गर्मी में जब हम सब, ए.सी. में बैठे होते हैं,
वे जलती हुई मरुभूमि में, अरिदल पर दृष्टि रखते हैं
आजादी तभी बचेगी जब तुम सैनिक का सम्मान करो,
जो पेट तुम्हारा भरता है, उन कृषकों का कुछ ध्यान करो।
पाश्चात्य सभ्यता को त्यागो, गाँवों में जाकर काम करो,
सच्चा जीना केवल वह है,जब देश के हित में काम करो॥