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स्वतंत्रता का अतीत और वर्तमान परिदृश्य

डॉ. विद्या ‘सौम्य’
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
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आज़ादी….और आज हम (१५ अगस्त विशेष)…

“स्वतंत्रता का अर्थ केवल बेड़ियों का टूटना नहीं है, बल्कि एक ऐसा जीवन है जो दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान और संवर्द्धन करता है।”  नेल्सन मंडेला।
     स्वतन्त्रता या आजादी केवल एक शब्द नहीं, बल्कि मनुष्य की मूल प्रवृत्ति, उसकी आत्मा की आवाज और उसके विकास की अनिवार्य शर्त है। जन्म के साथ ही हर जीव स्वतंत्र होना चाहता है। मानव के संदर्भ में आजादी का दायरा केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक, सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक स्वतंत्रता का एक व्यापक एवं जीवंत अहसास है।
आजादी केवल एक शब्द नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के त्याग, बलिदान, तपस्या और अदम्य साहस का परिणाम है। १५ अगस्त १९४७ को जब भारत ने ब्रिटिश शासन की गुलामी की बेड़ियों को तोड़ा, तो वह केवल एक राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक नए राष्ट्र के उदय का शंखनाद था। आज जब हम स्वतंत्र भारत में साँस ले रहे हैं, तो यह सोचना आवश्यक है कि हमने इस आजादी को क्या रूप दिया है और आज के दौर में ‘हम’ यानी देश के नागरिक इस स्वतंत्रता के प्रति कितने उत्तरदायी हैं ? आज़ादी को यदि हम साहित्य, संस्कृति और इतिहास के फलक पर देखें तो यह केवल एक भौगोलिक सीमा या राजनीतिक सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं है। यह मनुष्य की अंतरआत्मा की वह मौलिक पुकार है, जो सृजन, चेतना और अनंत की यात्रा से जुड़ी है। जब हम ‘आजादी’ और ‘हम’ (मानव समाज) के परस्पर संबंधों का संधान करते हैं, तो ज्ञात होता है कि यह संबंध अधिकारों और कर्तव्यों का सपाट समीकरण नहीं, बल्कि एक अगाध दार्शनिक एवं नैतिक अनुबंध है।
    साहित्यिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से स्वतंत्रता की परिकल्पना २ ध्रुवों के बीच झूलती है—बाह्य स्वतंत्रता और आंतरिक मुक्ति।
   बाह्य स्वतंत्रता… राज्य के दमन चक्र, सामाजिक संकेंद्रीकरण और अन्यायपूर्ण शासनों के विरुद्ध विद्रोह की भूमि है। यह वह धरातल है, जहाँ मनुष्य अपनी मुखर वाणी और सामूहिक शक्ति से परतंत्रता की जंजीरों को पिघलाता है।
आंतरिक धरातल के संदर्भ में आजादी… कबीर, विवेकानंद और महात्मा गांधी जैसे मनीषियों ने जिस स्वतंत्रता की वकालत की, वह चित्त की शुद्धि और भय से मुक्ति है। जब तक मनुष्य का अंतःकरण लोभ, मोह, संकीर्णता और पूर्वाग्रहों से आबद्ध है, तब तक वह राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होने पर भी आन्तरिक रूप से गुलाम ही रहता है। सच्ची आज़ादी व्यक्ति को अपनी अंतर्निहित संभावनाओं के चरम विस्तार का अवसर देती है।
      इतिहास के पन्नों को पलटते हुए अपने देश की अतीत धरोहर में दृष्टिपात करते हैं, तो पाते हैं कि हम भारतीयों के लिए १५ अगस्त का दिन भारतीय इतिहास का सबसे स्वर्णिम और महत्वपूर्ण दिन है। सदियों की गुमनामी, अत्याचार और विदेशी शासन की बेड़ियों को तोड़कर भारत ने स्वतंत्र वायु में साँस ली थी। सदियों की औपनिवेशिक दासता के पश्चात १९४७ का सूर्य केवल एक तिथि का उदय नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता का पुनर्जागरण था, किंतु इस स्वतंत्रता के मूल में अनगिनत बलिदानों की जो मसि लगी है, वह हमें स्मरण कराती है कि यह कोई अनायास मिला उपहार नहीं, बल्कि युगों की साधना का प्रतिफल है।महात्मा गांधी, भगतसिंह, सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे महान सेनानियों ने अपने प्राणों की बाजी इसलिए लगाई थी, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ खुली हवा में साँस ले सकें। उन्होंने जिस भारत का सपना देखा था, वह एक ऐसा देश था जहाँ हर नागरिक भय, भूख और शोषण से मुक्त हो। जहाँ समानता, न्याय और बंधुत्व की भावना सर्वोपरि हो। यहाँ तक कि साहित्य भी इस संघर्ष का सारथी आलोचक और प्रस्तोता रहा है।जब-जब देश और समाज में संकट आया है या आजादी के मायने बदले हैं;तब-तब साहित्य ने समाज को एक नई दिशा दिखाई है।
    हमारा भारत देश जिस समय अंग्रेजों की दमन पूर्ण नीतियों के दुष्चक्र में पिस रहा था, अंग्रेजी सत्ता की बेड़ियों में जकड़ी, भारत माँ अपने सपूतों से स्वतंत्रता की गुहार लगा रही थी, उस समय हमारे देश के वीर जवान, चिंतनशील नेता और भारतीय मनीषी ही नहीं बल्कि देश के प्रबुद्ध साहित्यकारों ने भी अपने साहित्य (लेखन) में ओजपूर्ण रचनाओं के माध्यम से भारतीय जनता की चेतना को जागृत किया।
भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामनरेश त्रिपाठी तथा जयशंकर प्रसाद आदि साहित्यकारों ने भारतीय जनता की रगों में स्वतन्त्रता की भावना को उद्वेलित कर अपने दायित्वों का पूरी तरह से निर्वाह किया। जयशंकर प्रसाद की कविता अपने देश के अतीत का गौरव गान ही नहीं करती, बल्कि यह भारतीय जनमानस में देशभक्ति, वीरता, साहस और राष्ट्रीय गौरव की भावना जगाती है….-
हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती,
स्वयं प्रभा उज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती!
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो! बढ़े चलो!
शिवा की आज्ञा से, बिखर सरोत्सवों करो,
अशेष शत्रु-सैन्य को मरोड़ कर धरो!
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो! बढ़े चलो!
       स्वतंत्रता पूर्व का भारत अंग्रेजों की दासता में जकड़ा भारत था, किंतु जैसे ही हम आजाद हुए हमारे देश के समक्ष बहुत-सी चुनौतियाँ थी। हमें एक नए वृक्ष की तरह खड़े होना था, अपनी मजबूत जड़ों के साथ नई-नई टहनियों और कोपलों को भी विकसित करना था। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विपन्न होते राष्ट्र को सम्पन्न बनाना था। पुनः भारत देश को समृद्ध बनाना था। धीरे-धीरे विकास की गति आगे बढ़ती गई और आज हम आजादी के ‘अमृत काल’ में हैं। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से उभरती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। तकनीक, अंतरिक्ष अनुसंधान (जैसे चंद्रयान और मंगल मिशन) और डिजिटल क्रांति के क्षेत्र में हमने वैश्विक स्तर पर अपनी एक मजबूत पहचान बनाई है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश में लोकतंत्र आज भी पूरी जीवंतता के साथ फल-फूल रहा है, किन्तु प्रगति की इन चमकती तस्वीरों के पीछे कुछ ऐसी कड़वी सच्चाइयाँ भी हैं, जिन पर विचार करना वर्तमान परिदृश्य में आवश्यक है:
  आज जब हम एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में इक्कीसवीं सदी के गंतव्य पर खड़े हैं, तो प्रश्न यह उठता है कि इस सामूहिक ‘हम’ ने आजादी के सरोकारों को कहाँ तक चरितार्थ किया है ?
   आज़ादी का अर्थ प्रायः बेलगाम उपभोग और स्वार्थ-सिद्धि मान लिया गया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन और उसका दुरुपयोग दोनों ही समाज के नैतिक पतन के लक्षण हैं। राजनीतिक व सामाजिक स्वतंत्रता मिलने के बावजूद हमारा समाज आज भी जातिवाद, वर्ग-भेद, आर्थिक असमानता, लैंगिक विडम्बनाओं और वैचारिक संकीर्णता की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। जब तक समाज के अंतिम छोर पर बैठा व्यक्ति भय और अभाव से मुक्त नहीं होता, तब तक हमारी यह स्वतंत्रता अधूरी और एकांगी है।
   जातिवाद, क्षेत्रवाद, लिंगभेद और भ्रष्टाचार जैसी बीमारियाँ आज भी हमारे समाज को अंदर से खोखला कर रही हैं। महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराध आज भी एक गंभीर चिंता का विषय हैं।
   अंधाधुंध विकास और शहरीकरण के कारण पर्यावरण का क्षरण हुआ है। प्रदूषण, वैश्विक ताप और जल-संकट आज हमारे अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं।
समाज में भौतिकवाद इस कदर हावी हो गया है, कि मानवीय मूल्य, संवेदनाएँ और राष्ट्रहित पीछे छूटते जा रहे हैं।
   आज देश की कुल आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा युवा है। भारत की असली ताकत उसकी युवा शक्ति में निहित है, पर आज का बेरोजगार युवा अपने कैरियर और भविष्य को संवारने की जद्दोजहद से जूझ रहा है। आज की युवा पीढ़ी से अपील है, कि उन्हें सोशल मीडिया पर नारे लगाने से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर सकारात्मक बदलाव लाने होंगे। महिलाओं को भी अपने अस्तित्व की रक्षा करते हुए समाज और देश में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करनी ही होगी, क्योंकि… आजादी हमें केवल अंग्रेजों से मुक्ति का अधिकार नहीं, बल्कि अपने भाग्य का निर्माता स्वयं बनने का अवसर देती है।
इतिहास गवाह है, कि जिन समाजों ने अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक स्वतंत्रता को ताक पर रख दिया, उनकी भौतिक समृद्धि भी अंततः उनके पतन का कारण बन गई। जब तक समाज इन बुराइयों से मुक्त नहीं होता, तब तक सच्ची आज़ादी अधूरी है।
   आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम यह संकल्प लें, कि हम न केवल अपनी आज़ादी की रक्षा करेंगे, बल्कि समाज के हर वंचित और शोषित व्यक्ति को उसके हिस्से की आज़ादी तथा सम्मान दिलाने में अपना योगदान देंगे। सच्ची आजादी तभी सार्थक है जब ‘हम’ सब मिलकर इसे गरिमा और जिम्मेदारी के साथ जिएं।
    आजादी एक स्थिर अवस्था नहीं, बल्कि एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है—एक ऐसी साधना जिसे हर पीढ़ी को नए सिरे से अर्जित करना पड़ता है। यह एक ऐसी मशाल है, जिसकी लौ को बुझने न देना वर्तमान और भविष्य के हर नागरिक का पवित्र कर्तव्य है।
    यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियां एक भयमुक्त, न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज में साँस लें, तो हमें अपनी वैचारिक संकीर्णता को त्यागकर ‘हम’ के व्यापक अर्थ को आत्मसात करना होगा। सच्ची आज़ादी वही है, जो दूसरों को भी स्वतंत्र होने का अधिकार और आकाश दे।