संजय एम. वासनिक
मुम्बई (महाराष्ट्र)
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आज़ादी… और आज हम (१५ अगस्त विशेष)…
सरहद पर सिपाही जागता है,
तभी घर में चैन की नींद आती है
आजादी हवा में नहीं मिलती,
शहीदों के लहू से सींची जाती है।
कल नारे लगे थे ‘इंकलाब’,
आज नारे लगते हैं ‘कर्तव्य’
कल आजादी के लिए जान दी,
आज आजादी के लिए जान लगानी है।
आजादी मिली थी खून से,
आज आजादी निभानी है खून पसीने से
सरहद की ड्यूटी हो या खेत की मेहनत,
हर हाथ में देश की जिम्मेदारी है।
आजादी का मतलब बदला है,
आजादी का मतलब सिर्फ छुट्टी नहीं
आजादी का मतलब है-
देश के लिए खड़े रहना, और कमजोर का साथ देना।
कल तलवार से मिली थी,
आज कलम से जीती जाती है।
आजादी १९४७ में मिली थी,
२०२६ में उसे संभालना है।
कल आजादी थी – साँस लेना,
आज आजादी है – सच बोलना
कल आजादी थी – झंडा फहराना,
आज आजादी है – अपने सपने सजाना।
कल हमने आजादी मांगी थी,
आज हमें आजादी निभानी है
क्योंकि आजादी मिली नहीं है,
आजादी कमाई जाती है।
अभियंता हो या किसान हो, टीचर हो या डॉक्टर हो,
हर वर्दी में देश बसता है।
संविधान को याद रखना दोस्तों,
डरना नहीं, झुकना नहीं, आज बस बढ़ते जाना है॥