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स्वयं बदलें और भारत को शिखर तक पहुँचाएँ

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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भारतीय संस्कृति में सावन केवल वर्षा ऋतु का एक महीना नहीं, बल्कि प्रकृति, अध्यात्म, प्रेम, लोकजीवन, त्याग और नवसृजन का उत्सव है। सावन आते ही धरती हरित वस्त्र धारण करती है, आकाश मेघों से भर जाता है और रिमझिम वर्षा जीवन में नई उमंग भर देती है। इसी सावन का सर्वाधिक आत्मीय सम्बन्ध भगवान शिव से जुड़ता है। शिव- जो संहार में सृजन का बीज देखते हैं, विष पीकर लोकमंगल करते हैं और वैराग्य में भी करुणा का महासागर हैं—सावन के आराध्य बनकर जन-जन के हृदय में बसते हैं।
    सावन के शिव-सम्बन्ध की जड़ें भारतीय पुराण-परम्परा और लोकविश्वासों में गहरी हैं। समुद्र-मंथन से निकले विष को भगवान शिव द्वारा लोककल्याण के लिए अपने कंठ में धारण करने की कथा नीलकंठ शिव की करुणा और त्याग का महान प्रतीक है। सावन की वर्षा और जलाभिषेक इसी शिवतत्व से लोकमानस में जुड़ते हैं। शिवलिंग पर जल, दुग्ध, बिल्वपत्र आदि अर्पित करना भक्त के लिए केवल पूजा-विधि नहीं, बल्कि अहंकार को शीतल करने और जीवन में संयम, सत्य तथा करुणा प्रतिष्ठित करने का संकल्प है।
सावन में काँवर यात्रा विशेष धार्मिक और सामाजिक स्वरूप ग्रहण करती है। शिवभक्त पवित्र जल लेकर पैदल यात्रा करते हैं और शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। काँवर केवल कंधे पर रखा पात्र नहीं; वह श्रद्धा, अनुशासन, संकल्प और सामूहिक आस्था का प्रतीक है। यात्रा की कठिनाइयाँ भक्त को सिखाती हैं कि लक्ष्य जितना पवित्र हो, उसके लिए श्रम और संयम भी उतना ही आवश्यक है।
  सावन का दूसरा रूप लोक-सौन्दर्य है। गाँव-नगर में झूले पड़ते हैं, रिमझिम फुहारें बरसती हैं, कजरी और लोकगीत गूँजते हैं, नववधुओं और बेटियों के मायके लौटने से घर-आँगन में उल्लास आता है। हरियाली धरती को नया जीवन देती है। यह प्रकृति हमें बताती है, कि परिवर्तन जीवन का स्वाभाविक नियम है। कालचक्र निरन्तर घूमता है; पतझड़ के बाद हरियाली और सूखे के बाद वर्षा आती है।
  हमारे लिए सावन केवल शिवभक्ति तक सीमित नहीं होना चाहिए। यही वर्षा-ऋतु स्वतंत्रता-दिवस की राष्ट्रीय चेतना को भी अपने साथ लेकर आती है। अगस्त का तिरंगा हमें उन शहीदों का स्मरण कराता है जिन्होंने स्वतंत्र भारत के लिए अपना सर्वस्व अर्पित किया। शिव का विषपान और शहीदों का बलिदान—दोनों में लोकमंगल और आत्मसमर्पण की अद्भुत समानता दिखाई देती है।
   आज ‘हम भारत के भरत’ बनें- अर्थात् राष्ट्र को परिवार मानकर उसके प्रति कर्तव्य निभाएँ। तिरंगे का सम्मान केवल ध्वजारोहण तक सीमित न रहे;वह हमारे चरित्र, कर्म और व्यवहार में दिखाई दे। खेतों की हरियाली, सीमा के प्रहरी की वीरता, नागरिक के श्रम, वैज्ञानिक की साधना और युवा के स्वप्न—इन सबमें भारत की प्रगति का स्वर निहित है।
  शिव और सावन हमें तीन महान जीवन-सूत्र देते हैं—विष को अमृत में बदलने की क्षमता, परिवर्तन को स्वीकार करने का साहस और लोकमंगल के लिए स्वयं को समर्पित करने की भावना। काँवर हमें संकल्प सिखाती है, झूले जीवन में उल्लास भरते हैं, रिमझिम वर्षा आशा जगाती है और तिरंगा स्वतंत्रता तथा राष्ट्रगौरव का स्मरण कराता है। हरियाली विकास की सम्भावना है, वीरता सुरक्षा की शक्ति और शान्ति प्रगति की आधारभूमि।
  अतः, सावन को केवल उत्सव न बनाकर आत्मपरिष्कार, पर्यावरण-संरक्षण, सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रभक्ति और कर्मशीलता का पर्व बनाना होगा। शिव का त्रिशूल हमें विवेक, साहस और अनुशासन का संदेश देता है। कालचक्र निरन्तर परिवर्तनशील है; जो समाज समय के साथ अपने आदर्शों को जीवित रखते हुए आगे बढ़ता है, वही प्रगति का वास्तविक अधिकारी बनता है। यही शिवमय सावन का सच्चा सन्देश है—स्वयं बदलें, समाज बदलें और भारत को शान्ति, शक्ति एवं प्रगति के शिखर तक पहुँचाएँ।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥