बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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ना होता समय किसी का,
न राजा का होता, ना ही होता रंक का।
कौन है जो इसे बाँध सके मुट्ठी में,
था कौन ऐसा इतिहास में ?
कल तक जो थे सिंहासन पर,
आज रह गए बस स्मृति में,
बताया घड़ी की टिक-टिक ने,
वैभव क्षणिक धाम रह गए।
जो आज गर्व में हँसता है,
कल आँसू भी करते उसका इंतज़ार।
झुककर समय के चरणों में ही,
पन्ने भाग्य के करते आकार।
न किसी से रुकता यह है,
न मानता आदेश किसी का।
देखे कर्मों का लेखा-जोखा,
फल दे देता, पर पक्षपात न करता।
मत कर हे मनुज अभिमान,
न हताश हो अंधकार में ही।
समय किसी का नहीं होता,
पर अवसर देता इस संसार में ही॥