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पूजा और पाखंड के बीच खड़ा मनुष्य

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह पूजा को साधना कम, प्रदर्शन अधिक बना लेता है। मंदिर, मस्जिद, गिरजों और गुरुद्वारों में भीड़ बढ़ रही है, पर पड़ोस के भूखे की थाली खाली है। माथे पर तिलक, हाथों में माला, होंठों पर मंत्र और व्यवहार में छल, संवेदना का अभाव है। यह विरोधाभास पूजा और पाखंड के बीच खड़े मनुष्य का सच है।
पूजा का अर्थ आत्मशुद्धि है-
अपने भीतर की हिंसा, ईर्ष्या, लोभ और अहंकार को पहचानकर उसे साधना, जबकि पाखंड का अर्थ है-उसी भीतर की गंदगी पर सुगंध छिड़क देना। हम अक्सर कर्म की कठिन साधना से बचकर प्रतीकों की आसान राह चुन लेते हैं। घंटी बजाना सरल है, किसी के आँसू पोंछना कठिन। दान का चित्र साझा करना आसान है, न्याय के लिए खड़ा होना कठिन। इसी सुविधा-प्रधान चयन से पाखंड जन्म लेता है।
समाज में धार्मिक पहचान कई बार नैतिक आचरण का विकल्प बन जाती है। हम कहते हैं, “मैं आस्तिक हूँ”, पर आचरण में नास्तिकता झलकती है। पूजा जब करुणा से कट जाती है, तो वह केवल रस्म रह जाती है। व्रत तब व्यर्थ है, जब पड़ोसी के अधिकार पर उपवास रखा जाए। ग्रंथों का पाठ तब खोखला है, जब कर्म में सत्य का साहस न उतरे। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को मनुष्य बनाना है;यदि वह दूसरों को कुचलने का औज़ार बन जाए, तो वह धर्म नहीं;पाखंड है।
आज का समय ‘दिखावे की आस्था’ को पुरस्कृत करता है। मंच, माइक और मंचन में भक्ति की चमक है, पर श्रमशील हाथों की धूल से नज़रें चुराई जाती हैं। आस्था का बाज़ारीकरण हुआ है, पूजा-पाठ के पैकेज हैं, नैतिकता के नहीं। हम कर्म के मूल्यांकन से बचने के लिए कर्मकांड का सहारा लेते हैं। इससे आत्मा को क्षणिक तसल्ली मिलती है, परिवर्तन नहीं।
समाधान किसी पूजा-विरोध में नहीं, पूजा की पुनर्व्याख्या में है। पूजा वही जो जीवन सींचे-न्याय के पक्ष में खड़ा होना, कमजोर के लिए आवाज़ उठाना, अपने लाभ से पहले दूसरों के अधिकार को मान देना। जब श्रम का सम्मान होगा, तब भक्ति विश्वसनीय होगी। जब सच बोलने का साहस होगा, तब मंत्र सार्थक होंगे। जब करुणा कर्म बनेगी, तब मंदिर मन के भीतर बनेंगे।

अंततः, प्रश्न यह नहीं कि हम कितनी पूजा करते हैं, यह है कि पूजा हमें कितना मनुष्य बनाती है। यदि हमारी आस्था किसी का दुःख कम नहीं कर पा रही, तो हमें अपने पाखंड से आँख मिलानी चाहिए। मनुष्य जब करुणा को कर्म बनाता है, तब पूजा सच्ची होती है;अन्यथा वह केवल शोर है-आत्मा की खामोशी ढकने का शोर।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥