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कर दो तृप्ति

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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अधरों ने कहा अधरों से,
जरा ठहरो ! क्यों तुमने यूँ तड़पाया मुझे
अधर कहीं एक होते नहीं,
जब तक ना दोनों मिलें।

अपने अधर से तुम्हारे अधर,
मिल कर पा जाते तृप्ति
प्यासे हैं मेरे अधर बहुत,
अधरों से छू कर कर दो तुम तृप्ति।

तब मैं न रहूं तुम न रहो,
रह जाए सिर्फ मेरे तुम्हारे
दरम्यान अनमोल तृप्ति
वो सारे क्षण अहसास तेरे होने के,
मेरे पास निकट तुम न रहो
पर यह अहसास तो है,
तेरे होने से मेरे पास।
लो मैं हो गई तृप्त,
अधरों ने कहा अधरों से जरा…॥