बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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रंगों की उन्मुक्त हवाएँ
जब आती हैं,
फागुन का संदेश,
फिर वो लाती हैं
आँगन-आँगन जब गूँज उठते हैं,
उमंग, स्नेह और हँसी के फव्वारे विशेष।
पर होली इस बार कुछ कहती,
नारी की पहचान रंगों में भी हो जाती
वह गालों पर गुलाल से ज्यादा,
अपने सपनों को रंगती
कोमल मुस्कान को दृढ़ बनाती,
मीरा-सा अटूट विश्वास है रखती
दुर्हर मन में दुर्गा-सी शक्ति जगती।
साहस का उजला प्रकाश है रखती,
छींटा-कशी बिलकुल ना करती
ना हो शब्दों में कटु व्यंग्य रखती है,
होली पर सम्मान अपना रखती है।
नारी का हो गौरव-अनंग,
चूल्हे-चौके की सीमाओं से
बाहर आए उसकी भी उड़ान,
रंगों-सी वह भी बिखर सके,
लेकर अपना स्वाभिमान।
पिचकारी हो अब हाथों में
सपनों की और अधिकारों की,
भीग जाए आँचल खुशियों से
धूल मिटे सब लाचारियों की।
ऐसी होली आओ खेलें-
जहाँ हो रंग बराबरी का,
हँसे नारी निडर हो करके,
मधुमास-सा बने जीवन।
नवगीत गाते सब फाल्गुन के,
स्नेह, सम्मान, समता की बोली।
नारी के उजले भविष्य संग खोली,
खिले सदा यह रंगीली होली॥