अंतरमहाविद्यालय मातृभाषा कविता प्रतियोगिता…
दिल्ली।
मातृभाषा कितनी भी वैज्ञानिक या अवैज्ञानिक क्यों न हो, मातृभाषा से बढ़कर दुनिया में कोई भाषा नहीं होती। भारत की सभी भाषाएं विश्व की श्रेष्ठतम भाषाएं हैं, क्योंकि इनका मूल स्रोत विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा संस्कृत है। अपने मोबाइल में भले ही हुए अंग्रेजी की रोमन लिपि भी रखें, लेकिन अपनी मातृभाषा या देश की भाषा हिंदी की लिपि को भी रखना चाहिए। जहां तक संभव हो, सोशल मीडिया पर संवाद के लिए भारतीय भाषाओं का प्रयोग करें।
मुख्य अतिथि के रूप में राजभाषा विभाग के पूर्व क्षेत्रीय उपनिदेशक डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ ने यह बात पीजीडीएवी महाविद्यालय (सांध्य) में कही। अवसर बना ‘मातृभाषा दिवस’ (२१ फरवरी) के पर दिल्ली विवि के पीजीडीएवी महावि. में अंतर महाविद्यालय मातृभाषा कविता प्रतियोगिता का। इसमें विभिन्न महाविद्यालयों से उपस्थित सहभागियों ने अपनी कविताएं सुनाई और उसका अनुवाद भी प्रस्तुत किया।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात देखने में आई कि प्रतिभागियों में उत्तर पूर्व के प्रतिभागियों की अच्छी-खासी संख्या रही। प्रतियोगिता में उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम सभी राज्यों के प्रतिभागियों ने भाग लिया और सिद्ध किया कि देश के सभी भाषा-भाषी, भले ही प्रचलित व्यवस्था के कारण अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे हों, लेकिन सभी को अपनी मातृभाषा से बहुत लगाव है।
इस अनूठी प्रतियोगिता के आयोजन का विचार महावि. के प्राचार्य प्रो. रविंद्र गुप्ता का था। प्रो. गुप्ता ने प्रतियोगी विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन किया और मातृभाषा के महत्व को रेखांकित किया। प्रतियोगिता में उत्तर पूर्व की (मणिपुर) की मूल निवासी और दिल्ली विवि की प्राध्यापक श्रीमती अचिन्ल्यू कामिनी तथा श्रीमती कामिनी रावत ने निर्णय किया। यह आयोजन उत्तर पूर्व की असमिया-भाषी प्राध्यापक सुश्री पल्लवी द्वारा किया गया।
(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुम्बई)