नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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मेरे मित्र के मन की रंगभूमि पर
मानसिक जकड़-बंदी है,
यह समाज का पहरा भी नहीं,
फिर भी न जाने कैसे बंदी है।
अपने विचारों को जाहिर करना
एक द्वंद्व-युद्ध के समान है,
यह एक ऐसा अँधेरा फैलाता है-
जहाँ अच्छी विचारधारा का प्रवाह भी बंद है।
मानसिक जकड़-बंदी से ऊपर उठकर
आगे बढ़ना हर मानव चाहता है,
लेकिन इस बंदी के कारण
वह भी डरा है।
भय के इस जंजाल को
तोड़कर फेंक डालोगे,
तभी सुविचार एवं प्रगति के
पथ पर आगे बढ़ोगे।
मानसिक जकड़न या मानसिक रोग कहें,
या दिमाग की विषम स्थिति!
जहाँ नकारात्मक सोच और पुरानी कड़वी,
गलत धारणाओं के जाल में फँस जाता है।
नई परिस्थिति में ढल नहीं सकना,
हर समय बुरा ही सोचना,
एक काम को बार-बार दोहराना
लगातार बार-बार हाथ धोना।
यह करती है
हमारी दिनचर्या प्रभावित,
यह बीमारी जिसे लोग सहते हैं।
रहे न उसका दिमाग नियंत्रित,
यह कर दे सबका जीना मुश्किल॥