कुल पृष्ठ दर्शन :

रचनात्मकता को एआई टूल्स से प्रभावित न होने दें

भोपाल (मप्र)।

एआई टूल्स के उपयोग से बच्चों के लिए किस प्रकार का साहित्य सृजन करना उपयुक्त होगा, वांछित बदलाव के लिए कैसा बाल-साहित्य उपयोगी होगा आदि एवं विश्लेषण के लिए साहित्यकार एआई टूल्स का प्रयोग करें, परंतु अपनी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता को इससे प्रभावित न होने दें l
साहित्य अकादमी मप्र द्वारा बाल-साहित्य पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. पूनम अग्रवाल (दिल्ली) ने ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में बाल-साहित्य’ विषय पर वक्तव्य देते हुए यह बात कही। ‘बाल-साहित्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव तथा डिजिटल युग में बाल-साहित्य की चुनौतियाँ और एआई का प्रभाव’ सत्र में एनसीईआरटी की पूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. अग्रवाल ने एक बिम्ब के माध्यम से एआई के सकारात्मक पक्ष को उभारा, साथ में चिंता जताई कि एआई, जेनरेटिव एआई और अब आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस जैसे नवाचारों के कारण एक ऐसा इकोसिस्टम बनने का भय दिख रहा है, जिसमें मानवीय कौशल की आवश्यकता कम होती चली जाएगी I डिजिटल क्रांति के युग में अपनी मौलिकता, विविधता और रचनात्मकता बनाए रखना साहित्यकार के लिए बड़ी चुनौती है।
‘गली बचपन की’ शीर्षक से अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे के कुशल नेतृत्व में वरिष्ठ बाल-साहित्यकार कृष्ण कुमार अष्ठाना जी की स्मृति में आयोजित इस संगोष्ठी के इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. विमला भंडारी ने की। डॉ. अग्रवाल, डॉ. अंजीव ‘अंजुम’ सहित ८ बाल-साहित्यकारों ने इसमें वक्तव्य प्रस्तुत कर सत्र को वैचारिक रूप से समृद्ध बनाया।

आयोजन में प्रसिद्ध बाल-पत्रिका ‘देवपुत्र’ के संपादक गोपाल माहेश्वरी व बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशिका डॉ. मीनू पांडे ने अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं।