नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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मधुर रिश्तों का आधार,
प्रेम में हार-जीत नहीं होती
एक समर्पण ही समर्पण होता,
विश्वास की नींव पर ही प्रेम का महल खड़ा होता।
प्रेम माँ से या परिवार से, या पति से,
किसी भी रिश्ते से हो, वो विश्वास पर ही टिकते
प्रेम का मतलब कशिश, जो हर पल बढ़ती ही जाए,
प्रेम की पहचान यही होती, यही कहलाते।
मधुर बनाते जाएँ प्यार से रिश्ते,
प्रेम हो जाए तब भी, उसकी विपरीत स्थिति होने पर भी
प्रेम बढ़ता जाए, यही सच्चा प्रेम है,
जो घटता है वो प्रेम नहीं कहलाता,
वो केवल स्वार्थ कहलाता।
अनमोल रिश्ते बनाए जाएँ प्रेम से,
प्रेम रूपी वृक्ष की अच्छी तरह देख-रेख करें
नहीं तो वे मुरझा जाते हैं, सूख जाते हैं,
इसी तरह हृदय में भी प्रेम बरसाएँ।
हर क्षण उसकी देख-रेख यत्नपूर्वक करें,
निस्वार्थ भाव जहाँ होगा, वहीं प्रेम की लता बढ़ती जाएगी
वे नष्ट नहीं होते और न होंगे,
आपसी प्रेम का अटूट सम्बंध बढ़ते जाएंगे।
आजकल टूट रही हैं रिश्तों की लड़ियाँ,
प्रेम से जोड़ें रिश्तों की कड़ियाँ अपनी।
प्रेम से मधुर रिश्ते बनाएँ,
यही जीवन की सच्ची साधना कहलाए॥