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पाप-ताप सब हर गई

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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कठिन भगीरथ तपस्या, आई   सुरसरि धाम।
पाप-ताप सब हर गई, लेकर शिव का नाम॥

बँधी हुई शिव की जटा, करती मंद प्रवाह।
धरती का कल्याण कर, बाँटे नव    उत्साह॥

पुण्य सलिल उतरी धरा, सगर-पुत्र उद्धार।
गंगाजल स्पर्श से, पापमुक्त संसार॥

गंगा केवल नीर नहीं, भारत की    पहचान।
सनातनी संस्कृति सरित, जनमानस सम्मान॥

गंगोत्री ऋषिकेश से, बहती    हरिद्वार।
तीर्थराज संगम बही, गंगासागर धार॥

कल-कल बहती संदेश।
प्रयाग से काशी तलक, हरती जनमन क्लेश॥

गंगा तट पर बस गई, परिपाटी  ऋषि संतp, ñ
वेद-पुराणों ने रची, ज्ञान-भक्ति  जीवन्त॥

मैला मन निर्मल बने, हर हर गंग पुकार।
लोभ-मोह सब त्याग कर, जोड़ो    प्रेम-प्रचार॥

बनी जाह्नवी पद्मजा, प्रथित त्रिपथगा लोक।
गंगाधर शिव शिर तिलक, सरजी जीवन शोक॥

भौगोलिक वरदान है, हरती धरती प्यास।
खेती, वन, जन-जीव सब, पाते नव उल्लास॥

गंगा दशहरा कहे, रखो नदी का मान।
जल-संरक्षण धर्म है, यही युगों का ज्ञान॥

पतितपाविनी भीष्मजा, भागीरथी महान।
ब्रह्मकमण्डल वासिनी, माँ कर मोक्ष प्रदान॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥