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बिखरते रिश्ते, सिमटते लोग

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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आज के रिश्ते बिखरने लगे,
सभी अपने स्वार्थों में ही लिपटे रहे।

लोग अपने आप में सिमटते गए,
सभी अपनी खुशी में ही मस्त होते रहे।

दुनिया की तरफ देखने से भी सहमते रहे,
बस अपने-आपसे ही सम्बन्ध रखते रहे।

ऊपर के फ्लैट में कौन रह रहे हैं, नहीं जानते,
क्योंकि नाता रखना ही नहीं चाहते दूसरों से।

सम्बन्ध नहीं रखने से एक-दूसरे से कटते गए,
आज की जीवन पद्धति रहने की, ऐसे ही बन रहे।

मोबाइल के सहारे ही सभी जी रहे,
आपस में बात-चीत भी मोबाइल के सहारे।

कोई क्या करें सभी अशान्त बने रहते अपने घर,
जो भी समय मिला उसमें आराम करने के मूड में रहते।

आज की दोहरी ज़िंदगी ही कारण बनती,
घर और बाहर का सामंजस्य स्थापित करना मुश्किल होता।

तब क्या होता, घर में ही सिमट कर रह जाते,
मन ही नहीं करता किसी से मिल- बैठ बात करने को।

समय की कमी, व्यस्त जीवन परेशान करता,
किसी को फुर्सत नहीं मिलती आज के व्यस्त समय में।

इसी लिए रिश्ते बिखरते गए।
और लोग अपने में सिमटते गए॥