पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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चंदन भइया मेरे पड़ोस में रहते थे। ६ फीट लंबा-ऊंचा कद, गौर वर्ण, गठा हुआ कसरती बदन, घुंघराले काले बाल और भूरी आँखें। एक बारगी तो लोग धोखा खा जाते थे, कि वह भारतीय है या अंग्रेज!
कॉलेज में नौकरी लगते ही रिश्तों की लाइन लग गई थी, लेकिन वह तो अपनी जिद पर अड़े थे कि उन्हें तो ट्रांसपेरेंट ब्यूटी (पारदर्शी सौन्दर्य) वाली लड़की ही चाहिए। उनकी अम्मा को हम लोग चाची कहते थे, बेचारी रोज-रोज एक नई फोटो लेकर हाजिर हो जाती कि- “देखो भाभी लड़की कितनी सुंदर है।”
लेकिन चंदन कुछ भी सुनने को ही तैयार नहीं थे। लड़कियाँ देखना और फिर रिजेक्शन होता रहा। समय बीतता रहा और चंदन भइया जब ३५ के हो गए तो सबके माथे पर चिंता की लकीरें पैदा होने लगीं।
अब अम्मा को भइया पर गुस्सा आने लगा, वह चिढ कर बोलीं, “आखिर तुझे कैसी लड़की पसंद है ?“
चंदन भइया अम्मा को छेड़ते हुए बोले,”मुझे तो ट्रांसपैरेट ब्यूटी चाहिए अम्मा।“
अम्मा चौक कर बोलीं, “ई टिरांसपिरैंट बूटी का होत है ?”
चंदन भइया ने हँसते हुए कहा, ”कैसै समझाऊं अम्मा, जब आएगी तो देख लेना।“
“चाहे जैसी भी लडकी ले आ, बस तू ब्याह कर ले बेटा।” अम्मा ने भोले अंदाज में कहा।
फिर एक दिन अम्माजी ने माँ को आकर बताया, कि चंदन भइया आजकल बड़े खुश रहते हैं। जब अम्माजी ने उनसे खुशी की वजह पूछी, तो उन्होंने फोन पर एक खूबसूरत लड़की की फोटो दिखा कर कहा, कि अब उन्हें उनकी ट्रांसपैरेंट ब्यूटी मिल गई है। अम्मा जी मारे खुशी के फूली नहीं समा रही थीं, उन्होंने तुरंत शादी का दिन भी तय कर दिया।
पता चला कि ‘गीत’ के साथ भइया की फेसबुक से दोस्ती हुई और फिर मुलाकातें होने लगी थी। वह १९-२० साल की अल्हड़-सी लड़की ‘गीत’ तो सच में सुंदरता की मिसाल थी। संगमरमरी श्वेत रंग, कजरारी आँखें और ठुड्डी पर काला तिल। चंदन भइया तो गीत को देखते ही उस पर मर मिटे थे। गीत के गाल भी भइया को देखते ही गुलाबी हो उठते और आँखों में सतरंगी सपने मचल उठे थे। ‘चट मंगनी, पट ब्याह’ हो गया था। चंदन भइया तो उसे अपलक निहारते रहते। शुरू के कुछ दिन लाड़-चाव और रीति रस्मों में बीत गये ।
सुबह जब चंदन उसके लिए किचन में चाय बना कर लेकर जाते दिखे, तो चाची को अटपटा लगा था कि जिस बेटे ने कभी किचन की तरफ झांका नहीं, वह आज बीवी के लिए चाय बना कर ले जा रहा है।
वह देर से उठती, किचन का काम उसे आता ही नहीं था। आता था तो केवल बनना-संवरना, बातों-बातों में गीत ने बता दिया कि उसे तो नॉनवेज पसंद है। उसे मछली अच्छी लगती है। चाची नाराज हो गई, “तुमने तो हमारा धर्म खराब कर दिया। हमारे घर पर यह सब मांस- मच्छी नहीं खाई जाती। “
अब तो चाची को वह एक निगाह नहीं सुहाती थी। किसी तरह से चंदन ने बात संभाली थी।
६ महीने बीतते-बीतते अब चाची को अपने आंगन में किलकारी चाहिए थी। वह हर महीने के बाद निराश हो उठतीं और गंडा-ताबीज, भभूत लाकर देतीं। कभी इस डॉक्टर, तो कभी उस डॉक्टर.. पर चाची की इच्छा पूरी नहीं हो रही थी। उसने तो कह दिया था कि “चंदन की भी तो डॉक्टर से जांच कराओ।” बस इसी बात पर चाची और गीत के बीच में शीत युद्ध शुरू हो गया था।
शाम को कॉलेज से घर आकर भइया ने गीत को समझाते हुए कहा,”शादी को साल पूरा होने वाला है। गीत अब हम लोगों को अपने बच्चे के बारे में सोचना चाहिए”।
“लेकिन मैं इसके लिए अभी तैयार नहीं हूँ चंदन। बच्चा होने के बाद मैं मोटी हो जाऊंगीं, फिर तुम मुझे प्यार नहीं करोगे”।
“तुम ये सोच भी कैसे सकती हो ? ‘तुम मेरी ट्रांसपैरेंट ब्यूटी हो, तुम्हारे चेहरे का मैं हर भाव पढ़ लेता हूँ। कभी तुम भी मेरे चेहरे का भाव पढ़ लिया करो। क्या तुम्हें मेरे चेहरे पर पिता बनने का भाव नजर नहीं आता” ?
“हाँ, नजर आता है चंदन, लेकिन मैं माँ बनना नहीं चाहती।”
अब प्यार की जगह तकरार ने ले ली थी। चाची भी नाराज रहने लगीं थीं, अब गीत उन्हें जरा भी नहीं सुहाती थी। चंदन भइया भी उनसे खिंचे-खिंचे रहते। अक्सर दोनों के कमरे से ऊँची-ऊँची आवाजें सुनाई पड़तीं। घर का माहौल बदल गया था। भइया की ट्रांसपैरेंट ब्यूटी अब अवगुणों की खान बन गई थी। रोज रोज की किच-किच से वह परेशान रहने लगी थी।
एक सुबह जब भइया सोकर उठे, तो उनकी ट्रांसपैंरेंट ब्यूटी घर से कहीं दूर जा चुकी थी।