सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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परिवार में जब कई सदस्य हों तो काम बढ़ ही जाता है। मुझे याद है मैं, मेरा भाई, दादी और मेरे चाचा और माँ-पापा, सब मिला कर छः लोग थे। माँ को पैरों में अक्सर दर्द हो जाता, बहुत भाग-दौड़ वाला काम नहीं कर पातीं थीं। वैसे जब तक सब घर में रहते, कोई परेशानी नहीं थी पर जब सब अपने-अपने काम पर निकल जाते, तो घर में माँ और दादी अकेली पड़ जातीं। अतः उन्होंने गाँव से काम करने के लिए एक लड़का बुलवा लिया।
शरण नाम था उसका, हर समय हँसता रहता और सब काम ख़ुशी-खुशी किया करता, पर पढ़ने में उसका मन ही नहीं लगता था।उसके लिए कॉपी, पेन, एक हिंदी, अंग्रेज़ी और गणित की पुस्तक भी आ गई। पापा ने सबको एक-एक विषय दे दिया, कि उसको कौन क्या पढ़ाएगा। हम लोग चाहते थे, कि वह कम से कम थोड़ा लिखना-पढ़ना और जोड़ना-घटाना सीख जाए। समय भागता रहा, सब अपने-अपने काम में व्यस्त।
जब से वह आया था, मैं देख रही थी कि जब वह खाने बैठता तो दाल और सब्ज़ी में से केवल एक ही लेता, कुछ दिन तो मैंने ध्यान नहीं दिया। मैंने सोचा, आज उसका दाल या सब्ज़ी खाने का मन नहीं होगा, पर जब रोज ही यही होने लगा तो मैंने पूछ ही लिया कि तुम दाल और सब्ज़ी दोनों क्यों नहीं लेते ? पर वह जो बोला उसे सुन कर मैं स्तब्ध रह
गई। वह बोला-अरे हम ग़रीब लोग नमक और प्याज़ के साथ रोटी खाने वाले अपनी आदत नहीं बदलना चाहते। आज आपके साथ हैं तो सब मिल रहा है पर जब यहाँ नहीं रहेंगे तब!! मैं तो केवल मजदूरी ही कर पाऊँगा, क्योंकि पढ़ने-लिखने में तो मन नहीं लगता, हम छोटे लोग, छोटी बातें। उसकी बात सुन कर मेरा मन कुछ दिन बहुत परेशान रहा।