डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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संयुक्त परिवार भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। यह केवल एकसाथ रहने की व्यवस्था नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, सहयोग, अनुशासन और पारिवारिक मूल्यों का सुदृढ़ आधार है। संयुक्त परिवार में दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहन तथा अन्य सदस्य एक ही छत के नीचे रहते हैं। सभी एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनते हैं और जीवन की चुनौतियों का मिलकर सामना करते हैं।
संयुक्त परिवार का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बच्चों को संस्कार, नैतिक शिक्षा और जीवन के व्यावहारिक अनुभव सहज रूप से प्राप्त होते हैं। बुज़ुर्गों का स्नेह, अनुभव और मार्गदर्शन उन्हें सही दिशा प्रदान करता है। परिवार के सदस्य एक-दूसरे का आर्थिक, सामाजिक तथा भावनात्मक सहयोग करते हैं, जिससे कठिन परिस्थितियाँ भी सरल हो जाती हैं। घर के कार्यों का उचित विभाजन होने से किसी एक व्यक्ति पर अनावश्यक बोझ नहीं पड़ता।
वर्तमान समय में शहरीकरण, व्यस्त जीवन-शैली तथा बढ़ती व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कारण एकल परिवारों का प्रचलन बढ़ा है। परिणामस्वरूप पारिवारिक आत्मीयता, सामूहिकता और संस्कारों का क्षरण भी देखने को मिलता है। बुज़ुर्गों का अकेलापन तथा बच्चों में सामाजिक मूल्यों की कमी जैसी समस्याएँ उभर रही हैं। ऐसे समय में संयुक्त परिवार की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है।
निस्संदेह, संयुक्त परिवार में कभी-कभी मतभेद और विचारों का टकराव भी होता है, किन्तु यदि सभी सदस्य परस्पर सम्मान, संवाद, सहिष्णुता और विश्वास बनाए रखें, तो हर समस्या का समाधान सहजता से निकल आता है। संयुक्त परिवार व्यक्ति को केवल सुरक्षा ही नहीं देता, बल्कि उसे उत्तरदायित्व, सामूहिक जीवन, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक समरसता का पाठ भी पढ़ाता है।
अतः संयुक्त परिवार भारतीय समाज की वह सशक्त संस्था है, जो प्रेम, अपनत्व, सहयोग और सांस्कृतिक मूल्यों की आधारशिला है। बदलते समय में भी यदि हम इसके आदर्शों को आत्मसात करें, तो सुदृढ़ परिवार, संस्कारित समाज और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण निश्चित रूप से संभव है।
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥