बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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विषम परिस्थितियाँ,
कभी अचानक नहीं आतीं
वे जन्म लेती हैं
घर की चुप्पियों में,
परंपराओं की कठोर दीवारों में
उन वाक्यों में
जहाँ हर निर्णय से पहले
उसका नाम नहीं,
उसका संबंध पूछा जाता है।
वह जन्म लेती है,
तो उसके भविष्य का लेखा-जोखा
दूसरों की अपेक्षाओं में लिख दिया जाता है,
उसकी हँसी की सीमा तय होती है,
उसके कदमों की दिशा,
उसके सपनों की ऊँचाई भी।
वह सीखती है
त्याग का पहला पाठ,
जबकि उसके भाई को
अधिकारों की वर्णमाला पढ़ाई जाती है
धीरे-धीरे
वह अपने हिस्से की इच्छाओं को
रसोई के धुएँ में,
आँगन की धूल में
और रिश्तों की सलवटों में,
रखना सीख जाती है।
समय बदलता है,
पर प्रश्न नहीं बदलते
वह पढ़ती है,
काम करती है
घर सँभालती है,
फिर भी हर उपलब्धि के बाद
उससे प्रमाण माँगा जाता है
कि वह ‘अच्छी स्त्री’ भी है।
जब वह अन्याय के विरुद्ध बोलती है,
उसकी आवाज़ से अधिक
उसके चरित्र की जाँच होती है
जब वह मौन रहती है,
तो उसी मौन को
उसकी स्वीकृति मान लिया जाता है।
विषम परिस्थितियाँ
केवल अभाव नहीं होतीं,
वे वह क्षण भी होती हैं
जब अपने ही लोग
उसकी पीड़ा को,
अतिशयोक्ति कहकर टाल देते हैं।
लेकिन
इतिहास गवाह है—
नारी केवल सहने के लिए नहीं बनी,
उसने हर युग में
राख से भविष्य उठाया है,
टूटे हुए विश्वासों से
नई पीढ़ियों का साहस गढ़ा है।
वह आँधियों से लड़ते हुए
पेड़ नहीं बनती,
वह जड़ों की तरह
धरती के भीतर फैलती है,
ताकि आने वाली बेटियाँ
थोड़ी अधिक निर्भय होकर
आकाश देख सकें।
उसकी शक्ति
शोर में नहीं,
उस धैर्य में है
जो अन्याय को पहचानता है
और एक दिन
उसे अस्वीकार कर देता है।
नारी की सबसे बड़ी विजय
किसी को पराजित करना नहीं,
स्वयं को बचाए रखना है—
अपनी संवेदना,
अपनी गरिमा
अपनी अस्मिता,
और अपने भीतर बची हुई रोशनी को।
विषम परिस्थितियाँ
उसे रोक सकती हैं,
थका सकती हैं
घायल कर सकती हैं,
पर यदि वह अपने अस्तित्व पर विश्वास बनाए रखे
तो वही परिस्थितियाँ,
एक दिन उसके संघर्ष का इतिहास बन जाती हैं॥