नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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चाँदनी रात में मैं तुम्हें ढूँढती रहती हूँ,
नज़र से नज़र बचाकर अपनों से तेरे पास आने को
तड़पती हूँ, मचलती हूँ, मेरा दिल तरसता है,
अपनी बाँहों में तुम्हें भर लेने को
मैं ढूँढती हूँ तुम्हें गलियों और राहों में,
पर तुम तो बसे हो फलों की खुशबू में और बच्चों की मुस्कान में।
कैसे तुम्हें ढूँढूँ, किस-किस से पूछूँ ?
मुश्किल है उस राह तक पहुँचना
वह मधुर गीत है या हमारी विवशता की पुकार ?
तुम्हें कैसे महसूस करूँ, यह समझ नहीं आता
मुझमें इतनी भक्ति भी नहीं,
कि तुम्हारे होने का सहज एहसास कर सकूँ
तुम कहाँ छिपे हो ?
मैं आगे-आगे चलती हूँ और तुम पीछे-पीछे चलते रहते हो।
तुम मेरे अंतर्मन में सदा छाए रहते हो,
जैसे चाँदनी मेरे घर-आँगन में बिखर जाती है
सब तारे निकल आते हैं और चाँद भी मुस्काता है,
मेरा मन ऐसे भर जाता है-
जैसे दूर गगन में बादल उमड़ आए हों
तुम तो वेश बदल-बदलकर घूमते रहते हो,
मैं तुम्हें कैसे पहचानूँ ?
मेरे मन में तुम्हारा कोई साकार रूप नहीं है।
मैं तुम्हें मंदिर में ढूँढूँ या मस्जिद में,
गिरजाघर में या देवालय में ?
पर तुम तो बसते हो दीन-दुखियों के हृदय में
धनवान तो तुम्हें ढूँढते-ढूँढते थक जाएँगे,
पर तुम उनके हाथ कहाँ आने वाले हो ?
यह तो केवल अंतरमन ही जानता है।
जो तुम्हें सच्चे हृदय से ढूँढता है,
तुम उसी के हृदय में निवास करते हो॥