राजू महतो ‘राजूराज झारखण्डी’
धनबाद (झारखण्ड)
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खो गया हूँ मैं संसार में
मोह माया के बाजार में,
चारों ओर रिश्तों का मेला है-
मेले के बीच मन मेरा अकेला है।
हँसता हूँ सबसे, हँसाता हूँ सबको
गम को छिपाकर गले लगाता हूँ,
दौड़ रहा हूँ हर रिश्ते निभाने में-
पर हार रहा हूँ स्वार्थी जमाने में।
सबको संभाला अपना समझकर
सभी संग चला उँगली पकड़कर,
आज मेरा पैर जग में डगमगाया है-
सभी छोड़ भागे, मन मेरा भर्राया है।
सोचता हूँ लौट छिप जाऊँ उस आँचल में
जहाँ हमने अपना बचपन सुरक्षित बिताया था,
जीवन में बस केवल प्यार ही प्यार पाया था-
माँ के चरणों में ही पूरा संसार समाया था।
ना मोबाइल था ना ही दिखावा था
आँगन की मिट्टी में प्यार का पहनावा था,
पिता की डांट में छिपा जीवन का ठाठ था-
दादी की कहानी में जीवन का विश्वास था।
खो गया हूँ आज भीड़ में भी तन्हा हूँ
उस प्यार सहित पुराने घर का दीवाना हूँ,
सोचता हूँ प्रभु भक्ति में जीवन को मोड़ लूँ-
प्रेम, शान्ति, भक्ति जहाँ फलें उसे मैं तोड़ लूँ।
छोड़ दूँ ये झूठी दुनिया की चाह,
ढूंढ लूँ मन में सच्चे प्रभु की राह।
क्योंकि मोह माया एक बंधन है,
प्रभु का नाम ही बस चंदन है॥
परिचय-साहित्यिक नाम `राजूराज झारखण्डी` से पहचाने जाने वाले राजू महतो का निवास झारखण्ड राज्य के जिला धनबाद स्थित गाँव-लोहापिटटी में है। जन्म तारीख १० मई १९७६ और जन्म स्थान धनबाद है। भाषा ज्ञान-हिन्दी का रखने वाले श्री महतो ने स्नातक सहित एलीमेंट्री एजुकेशन (डिप्लोमा) की शिक्षा प्राप्त की है। साहित्य अलंकार की उपाधि भी हासिल है। आपका कार्यक्षेत्र-नौकरी (विद्यालय में शिक्षक) है। सामाजिक गतिविधि में आप सामान्य जनकल्याण के कार्य करते हैं। लेखन विधा-कविता एवं लेख है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक बुराइयों को दूर करने के साथ-साथ देशभक्ति भावना को विकसित करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-प्रेमचन्द जी हैं। विशेषज्ञता-पढ़ाना एवं कविता लिखना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी हमारे देश का एक अभिन्न अंग है। यह राष्ट्रभाषा के साथ-साथ हमारे देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसका विकास हमारे देश की एकता और अखंडता के लिए अति आवश्यक है।