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शिक्षक को नमन

आचार्य संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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कवि नहीं, मैं काव्य-मरघट का भूत हूँ,
शिक्षकों के स्नेह से ही अभिभूत हूँ।

मैं शब्दों का नहीं, शिक्षा का दूत हूँ,
शिक्षकों की कृपा से प्रेरणा पूत हूँ।

शिक्षक दिवस पर शिक्षकों में अवधूत हूँ,
अंधकार के द्वार पर खड़ा यमदूत हूँ।

कई शिक्षकों के ज्ञान से फलीभूत हूँ,
उनकी पाठशाला से संस्कारित-सूत हूँ।

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन से अंगीभूत हूँ,
उनके शिक्षक-आदर्श से ही द्रविभूत हूँ।

मैं अक्षर नहीं, शब्दाक्षर अर्थ युक्त हूँ,
शिक्षक श्रद्धा से भाग्य-लेख प्रयुक्त हूँ।

शिक्षक की डाँट और प्रशंसा में छिपा अभियुक्त हूँ, 
शिक्षक के ज्ञान से ही प्रतिभा का रूप संयुक्त हूँ।

कक्षा की चार दीवारों में ही ब्रह्मांड दिखा,
शिक्षक ने पत्थर को घिसा, तराश सिखा।

नमन हर शिक्षक को, जिसने थामा हाथ मेरा,
अंधेरे में दीप बनकर, पथ प्रदर्शक बने मेरा।

मैं जो भी हूँ, शिक्षकों का ही प्रतिरूप हूँ,
उनके ऋण का आज चिर-ऋणी स्वरूप हूँ।

अशिक्षितों का मैं काल रात्रि यमराज हूँ, 
शिक्षक कृपा से शिक्षा को देता ताज हूँ॥

परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे आचार्य संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएस-सी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता व रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुम्बई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़े हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत,  कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। सम्मान-पुरस्कार में आपको महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ  कवि सम्मान-२०२३ सहित अन्य मिले हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार करना है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज-पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”