डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल
इन्दौर (मध्यप्रदेश)
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दीपावली की रात थी। बहुमंजिला इमारतें दीपों की रोशनी से जगमगा रही थीं। तेरहवीं मंजिल पर जल रही एक दीपक की लौ इतराते हुए मिट्टी की दीयाली से बोली, ‘देखो, मेरी रोशनी से पूरी धरती जगमगा रही है, मानो आकाशगंगा जमीन पर उतर आई हो, और एक तुम हो, जिसे कोई सम्मान तक नहीं देता!’
दीयाली मुस्कराई, ‘कैसी बचकानी बात कर रही हो !’
‘क्या कहा… बचकानी ?’
‘हाँ, बिल्कुल ! जैसे बच्चों से पूछो कि रावण को किसने मारा तो वे कहते हैं- राम ने। वे यह नहीं समझ पाते कि रावण को उसके अहंकार और अनीति ने मारा।’
लौ तुनक कर बोली, ‘अरे, मैं हूँ तो दीपावली की रौनक है। मैं नहीं, तो यह रोशनी भी नहीं!’
दीयाली ने समझाया, ‘इतने बड़े बोल अच्छे नहीं। क्या तुम हवा, तेल, माचिस और मेरे बिना प्रकाश दे सकती हो ? ईश्वर ने इस सृष्टि में सभी को एक-दूसरे से जोड़कर बनाया है। कोई भी अकेले पूर्ण नहीं है।’
लौ फिर इतराई, ‘मैं लौ हूँ, लौ! तुमसे श्रेष्ठ हूँ, मान लो।’ दीयाली बोली, ‘तुम तो नेताओं की तरह विग्रह की बातें कर रही हो।’
‘मुझे नेता मत कहो। यह शब्द गाली जैसा लगता है।’
दीयाली ने सहजता से कहा, ‘मैंने तुम्हें गलत नहीं कहा। आज के नेता जिस तरह अपनी पार्टी का आधार भूल गए हैं, ठीक उसी तरह तुम भी अपना आधार भूल गई हो।’
इस जवाब के बाद लौ की रोशनी तो जलती रही, लेकिन उसका अहंकार बुझ चुका था।