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भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा के अथक सेनानी बलदेव बंशी

प्रो. अमरनाथ
कलकत्ता (पश्चिम बंगाल)
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हिन्दी योद्धा………

भारतीय भाषाओं को उनका हक दिलाने के लिए १९८० के दशक में संघ लोक सेवा आयोग के द्वार पर वर्षों तक चलाए गए धरने के अध्यक्ष रहे बलदेव बंशी अपने संघर्ष के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। इसी संगठन से जुड़े पुष्पेन्द्र चौहान को भला कैसे भुलाया जा सकता है,जो १० जनवरी १९९१ को लोकसभा की दर्शक दीर्घा से नारा लगाते हुए गैलरी में कूद पड़े,उनकी पसलियाँ टूट गईं। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद चौहान ने संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा। उन्होंने कई वर्ष तक शास्त्री भवन के बाहर धरना दिया। धरने के दौरान बलदेव बंशी भी कई बार गिरफ्तार हुए थे। लगातार अनशन,धरना आदि करते हुए तथा अनेक सांसदों,पत्रकारों, साहित्यकारों आदि का समर्थन हासिल करते हुए उन्हें आयोग की कुछ परीक्षाओं में अंग्रेजी के साथ भारतीय भाषाओं को लागू करने में आंशिक सफलता भी मिली। निस्संदेह बलदेव वंशी एक प्रतिष्ठित साहित्यकार तो हैं ही,भारतीय भाषाओं को उनका हक दिलाने के आंदोलन में भी उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई है।
बलदेव बंशी ‘अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन’ के अध्यक्ष थे। उनका मानना था कि ‘आज सबसे बड़ी और पहली जरूरत ‘भारतीय भाषाएँ लाओ’ कहने की है। ‘अंग्रेजी हटाओ’ कहने की नहीं। ‘अंग्रेजी हटाओ’ कहना जहाँ नकारात्मक प्रभाव छोड़ता है,वहीं वह मात्र ‘हिन्दी लाओ’ मान लिया जाता है,जबकि भाषा समस्या के इतिहास से जरा-सा परिचय रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि अब अंग्रेजी को समूचे भारतीय जन और भारतीय भाषाओं की सम्मिलित ताकत ही हटा पाएगी… इसलिए ‘भारतीय भाषाएँ लाओ’ कहने से सकारात्मक वातावरण बनेगा और सभी भारतीय भाषाएँ आगे बढ़ेंगी। इनके बढ़ने से, शिक्षा-परीक्षा-रोजगार का माध्यम बनने से अंग्रेजी अपने आप पीछे हटेगी।’
डॉ. बंशी का जन्म अविभाजित भारत (वर्तमान पाकिस्तान) के वजीराबाद स्थित ननकाना साहिब के निकट शेखपुरा में हुआ था। उन्होंने विभाजन की त्रासदी अपनी आँखों से देखी थी’ उनका परिवार कई जगह भटकते हुए किसी तरह दिल्ली पहुँचा और बस गया। दिल्ली में रहते हुए उन्होंने पढ़ाई की और दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक बन गए।
‘भारतीय भाषाएँ लाओ,देश बचाओ’ शीर्षक से बलदेव बंशी ने एक पुस्तिका प्रकाशित करके उसे बड़ी संख्या में वितरित करवाया था जिसके अन्तिम कवर पृष्ठ पर पुष्पेन्द्र चौहान,राजकरण सिंह, हीरालाल,विघ्नेश्वर पाण्डेय और श्योचंद्र निर्वण के उद्वेलित करने वाले चित्र भी सत्याग्रह की मुद्रा में है। स्वभाषा के लिए संघर्ष वाले प्रख्यात योद्धा श्यामरुद्र पाठक ने एक बातचीत में बताया कि जिन दिनों वे (श्यामरुद्र पाठक) आयोग द्वारा लागू ‘सीसेट’ के विरुद्ध आन्दोलन कर रहे थे,पर्याप्त वृद्ध होने के बावजूद बलदेव बंशी बीच-बीच में धरने पर बैठने आया करते थे। इन्हीं दिनों धरना चलाने के लिए उन्होंने आर्थिक सहयोग की भी पेशकश की थी। बलदेव बंशी ने अपना आर्थिक सहयोग देने के लिए जिद कर लिया था और अंत में हमारे ऊपर इतना दबाव पड़ा कि उनके सम्मान को देखते हुए और नियम तोड़ते हुए प्रतीक रूप में उनसे एक सौ रूपए ग्रहण करने पड़े थे।
बलदेव बंशी मूलत: कवि तथा संत साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं। उनके एक दर्जन से अधिक काव्य संग्रह,१० आलोचनात्मक ग्रंथ, नाटक,संस्मरण आदि लेकर पचास से अधिक ग्रंथ प्रकाशित हैं। वे संत साहित्य अकादमी के अध्यक्ष भी थे।
७ जनवरी २०१८ को दिल का दौरा पड़ने से दिल्ली में बलदेव बंशी निधन हो गया। हम भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा के लिए किए गए उनके महान कार्यों का स्मरण करते हैं और उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन,मुंबई)

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