अनुप्रीत गुरुदेव की
संजीव एस. आहिरेनाशिक (महाराष्ट्र)****************************** ढूंढता रहा मैं दत्त दिगम्बर,अक्षरब्रह्म के सागर-सागर मेंएक-एक शब्द उतना ही रोचक,जैसे अमृत भरा हो गागर मेंहर गगरी से छलका अमृत,अमृत के कण-कण में अवधूतबहुत छोटी है झोली मेरी,आखिर कितना समेटे अमृतइतना नहीं है सामर्थ्य मुझमें,अन्जुरी में मेरी छेद बहुत हैबहुत सूक्ष्म है संचित अमृतकण,धीरे-धीरे रिस जाते जाने कब ?अन्जुरी मेरी … Read more