झकझोरते हैं अंतर्द्वंद
गोपाल मोहन मिश्रदरभंगा (बिहार)**************************************** अंतर्द्वंद मेरेझकझोरते हैं…यदा-कदा,मस्तिष्क नसेंचढ़ने लगती हैं…कोमल से भाव कभीशूल-सी प्रतीतिदेते हैं…भावों की अधिकता,जब आकाश छूती है…चित्त पथभ्रमितहोने लगते हैं…अनवरत लिखनेकी चाह,कचोटती है हृदय को…शुद्धता का,आत्मीय चिंतनबाँधे रखता है,विचारों में…बरबस ही,उपजती है कोई रचना..कलित अथवा अकलित…प्रदान कर जाती है,मनस कोगहन आमोद…।जैसे-तृप्त हो जाता हैचातक,स्वाति के मिलन से…॥ परिचय–गोपाल मोहन मिश्र की जन्म … Read more