बहुआयामी हैं कामकाजी महिलाओं की समस्याएं

पूनम चतुर्वेदी शुक्लालखनऊ (उत्तरप्रदेश)************************************** भारतीय समाज में जब कोई महिला यह निर्णय करती है, कि वह घर की चहारदीवारी से बाहर निकल कर कार्यस्थल पर अपनी प्रतिभा और परिश्रम से जीवन का निर्माण करेगी, तो यह निर्णय केवल आजीविका का नहीं, एक समग्र जीवन-दर्शन का, एक साहसिक चुनाव का प्रतीक होता है। वह महिला जानती … Read more

तुम क्या कर सकते हो ?

डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्लइन्दौर (मध्यप्रदेश)***************************************** “अच्छा एक बात बताओ, तुम प्रेम की दीवानगी में मेरे लिए क्या कर सकते हो ?”“शायरी की भाषा में कहूं तो… आसमान का चाँद और सितारे तोड़कर तुम्हारी जींस और अपर में टाँक सकता हूँ!”“वाह… वाह! क्या बात है! अच्छा इसके अलावा…?”“इसके अलावा… तुम इस सारे ब्रह्मांड में मुझे सबसे … Read more

बिहार:सत्ता परिवर्तन विकास या विचलन!

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मोड़ उस समय सामने आया, जब राज्य के लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नीतिश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने का निर्णय स्वीकार किया और इसके लिए नामांकन भी दाखिल कर दिया। उनके नामांकन के अवसर पर देश के गृह मंत्री का पटना … Read more

मुफ़्त का नशा

डॉ. शैलेश शुक्लाबेल्लारी (कर्नाटक)**************************************** बुधिया के गाँव में सरकारी योजनाएं आईं- राशन, गैस, बिजली बिल माफी, नकद। बुधिया खुश था।पहले साल उसने काम छोड़ा।“मिल तो रहा है।”दूसरे साल उसने खेत पड़ोसी को दे दिया।“मेहनत किसलिए ?”तीसरे साल उसके बेटे ने विद्यालय छोड़ा।“पढ़कर क्या करेंगे, फ़्री में सब मिलेगा।”पाँच साल बाद चुनाव आए। नेताजी गाँव में … Read more

मेरा बचपन और होली

प्रो.डॉ. शरद नारायण खरेमंडला(मध्यप्रदेश)******************************************* गाँव का रहने वाला हूँ। गाँव में उस समय लोगों में बहुत प्रेम-भाव व सद्भाव था। छोटे, बड़ों का बहुत सम्मान करते थे। होली पर हुल्लड़ नहीं होती थी। बच्चे-जवान, बूढ़े सभी मर्यादा में रहते थे, और एक-दूसरे का सम्मान करते थे।हम बच्चे सालभर होली का इंतज़ार करते थे। मैं अपने … Read more

परम्परा के रंग में डूब कर तो देखो…

पद्मा अग्रवालबैंगलोर (कर्नाटक)************************************ होली विशेष… भारतीय संस्कृति का अनुपम और पावन पर्व होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, वरन दिल की कटुता को भूलकर रिश्तों में मिठास घोलने का सुअवसर है। यह पर्व हमें सिखाता है, कि जीवन का सौंदर्य बाहरी आडम्बर में नहीं, वरन् संबंधों की मधुरता, मन की निर्मलता और व्यवहार की … Read more

दिल्ली शराब नीति:न्याय की जीत या देर से आई राहत ?

पूनम चतुर्वेदी शुक्लालखनऊ (उत्तरप्रदेश)************************************** २७ फरवरी को दिल्ली की एक विशेष अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसने भारतीय राजनीति की दुनिया को हिलाकर रख दिया। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों को दिल्ली शराब नीति घोटाले में बरी कर दिया गया। यह वह मामला था जिसने पिछले … Read more

शांति ही बदलती दुनिया की अनिवार्य अपेक्षा

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** नई बनती दुनिया का चेहरा जितनी तेजी से बदल रहा है, उतनी ही तेजी से वैश्विक असुरक्षा की भावना भी गहराती जा रही है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता टकराव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि वह ऐसे वैश्विक असंतुलन का संकेत है; जिसमें शक्ति संतुलन की पुरानी व्यवस्थाएं टूट … Read more

भारत में हैं एआई ‘महाशक्ति’ बनने की पूरी संभावनाएँ

डॉ. शैलेश शुक्लाबेल्लारी (कर्नाटक)**************************************** कृत्रिम मेधा (एआई) का युग केवल तकनीकी परिवर्तन का दौर नहीं है; यह वैश्विक शक्ति-संतुलन के पुनर्निर्माण का समय भी है। औद्योगिक क्रांति ने जिन देशों को आर्थिक नेतृत्व दिया, डिजिटल क्रांति ने जिन देशों को तकनीकी प्रभुत्व दिलाया, उसी क्रम में एआई क्रांति उन देशों को अगली वैश्विक बढ़त देगी, … Read more

हम सामाजिक उत्तरदायित्व भूलते जा रहे ?

पूनम चतुर्वेदी शुक्लालखनऊ (उत्तरप्रदेश)************************************** भारत स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है। हमारी सांस्कृतिक परंपरा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे आदर्शों पर आधारित रही है। परिवार, पड़ोस, ग्राम सभा और समुदाय-ये केवल सामाजिक इकाइयाँ नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की जीवित संरचनाएँ थीं, परंतु पिछले कुछ वर्षों की अनेक घटनाएँ और उपलब्ध आँकड़े … Read more