डराने लगी है आभासी खेल की लत

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** आभासी खेल (ऑनलाइन गेमिंग) की लत एवं दुनिया कितनी भयावह व घातक हो सकती है, इसकी एक ही दिन में २ अलग-अलग जगह घटी घटनाओं ने न केवल झकझोरा है, बल्कि यह हमारे समय, हमारी सामाजिक संरचना और सामूहिक असावधानी पर लगा हुआ एक गहरा प्रश्नचिह्न बना है। धीरे-धीरे किशोरवय को अपने … Read more

पुस्तकों से प्रेम बढ़ाएँ

पद्मा अग्रवालबैंगलोर (कर्नाटक)************************************ आज डिजिटल आपा-धापी के समय में पढ़ने की संस्कृति और पुस्तकों पर छाए हुए संकट की बात अक्सर होती रहती है, परंतु सुखद बात यह है कि आज भी पुस्तकों का अलग ही महत्व है। अंतरजाल के शुरुआती दौर में लोगों ने यह चिंता जताई थी कि सूचना का यह माध्यम पुस्तकों … Read more

कीमती आजादी

राधा गोयलनई दिल्ली****************************************** “हमें बोलने की आजादी है। जीने की आजादी है।” कुछ बिगड़ैल लोग बोले।एक छात्र- “किसने कहा, कि तुम्हें बोलने की आजादी नहीं है ? हमारे देश में संविधान में ही सभी को अभिव्यक्ति की आजादी है। सभी को जीने की आजादी है।”“मानते हो ना इस बात को ?”“बिल्कुल, लेकिन अभी मेरी बात … Read more

माहवारी:सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** भारत के सामाजिक विकास की यात्रा में महिलाओं की स्थिति हमेशा एक निर्णायक कसौटी रही है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल आर्थिक आँकड़ों या बुनियादी ढाँचे से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से आँकी जाती है कि वह अपने समाज के आधे हिस्से-महिलाओं को कितना सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर … Read more

अब दुनिया को चाहिए बेटियाँ

पद्मा अग्रवालबैंगलोर (कर्नाटक)************************************ वंश चलाने के नाम पर सदियों से बेटों की चाहत रखने वाली दुनिया की सोच अब बदल रही है। पहले लोगों ने बेटियों को दुनिया में आने से रोका, वहीं अब बेटों से ज्यादा बेटियों की चाहत बढ़ रही है। अब वह बोझ की तरह नहीं, वरन् वरदान समझी जा रही है। … Read more

ऐसी शिक्षा नीति की आवश्यकता, जो प्रतिभा को जाति से ऊपर रखे

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा विवि अनुदान आयोग के माध्यम से उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता के नाम पर लागू किए गए नए नियमों ने देश के शैक्षिक और सामाजिक परिदृश्य में एक बार फिर गहरी हलचल पैदा कर दी है। जिस नीति को ‘समता’, ‘समान अवसर’ और ‘समावेशी शिक्षा’ की भावना से … Read more

बातें मेरी ज़िंदगी की

ममता सिंहधनबाद (झारखंड)***************************************** बातें उन दिनों की है, जब मैं छोटी थी, दसवीं कक्षा में पढ़ती थी। पढ़ने में काफी तेज नहीं थी, मगर मन में हमेशा रहता था कि राज्य में अव्वल दर्जा लाऊं। इसलिए रात-दिन एक कर पढ़ती रहती थी। मुझे याद भी देर से होता था, इसलिए एक-एक प्रश्न के उत्तर हमेशा … Read more

अभिभावक समझें-बच्चा प्रतिष्ठा का साधन नहीं, स्वतंत्र व्यक्तित्व

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** जीवन को दिशा देने वाली शिक्षा यदि भय, हिंसा और दमन का पर्याय बन जाए तो वह सभ्यता की सबसे बड़ी विडम्बना कही जाएगी। हाल के वर्षों में पढ़ाई के नाम पर बच्चों पर बढ़ते दबाव, घर और शाला में हिंसक व्यवहार तथा प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ ने शिक्षा की आत्मा पर … Read more

भारत को गौरवान्वित करने की दिशा में प्रयास जरूरी

पद्मा अग्रवालबैंगलोर (कर्नाटक)************************************ संविधान से आम आदमी तक (२६ जनवरी विशेष)…. किसी भी देश के संचालन के लिए उसका संविधान बेहद अहम् होता है। हमारे भारत का संविधान दुनिया का सबसे अच्छा संविधान माना जाता है, क्योंकि इसमें हर किसी को समान अधिकार हैं। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व … Read more

महँगा सोना, हल्का रुपया और भारी पड़ती ज़िंदगी

अजय जैन ‘विकल्प’इंदौर (मध्यप्रदेश)***************************************** कहते हैं, “जब घर की थाली खाली हो, तब तिजोरी का सोना भी बोझ लगने लगता है।” यही बात आज भारत के आम आदमी की सच्चाई बन चुकी है। आम आदमी को कारण कुछ पता नहीं, पर बस यह पता है कि सोना और चाँदी ऐतिहासिक ऊँचाई पर हैं, लेकिन रुपया … Read more