सोच समय की
दुर्गेश कुमार मेघवाल ‘डी.कुमार ‘अजस्र’बूंदी (राजस्थान)************************************************** ऐ मन…,सोच फिर ऐसीक्यों सोचे,जो संभावनाओं से परे है।सोच कर ही जिसको,न जाने क्यों…?हर मन,मन ही मन डरे है।सुख के आँचल में,दु:ख की प्रतिछाया काही सारा कारण है।ऐसी सोच से,तेरी बेचैनी भी तोबिना कोई,सही कारण है।कुत्सित संभावनाओंको हमेशा कुरेदना,कहाँ अच्छा होता है ?सुख के आँचल मेंही तो मुँह ढक … Read more