स्वास्थ्य सबका अधिकार, तो ‘इलाज’ क्यों ‘बीमार’ ?

नीलम प्रभा सिन्हाधनबाद (झारखंड)********************************************* आज स्वास्थ्य पर सभी का अधिकार है, पर सबको अपार सुविधा नहीं मिलती है, जबकि यह मौलिक अधिकार है एवं सभी को सदाबहार सुविधा मिलनी चाहिए।    आज किसी गरीब को यदि बीमारी हो जाए, तो जीवन उसका नरक बन जाता है। पैसे की चिंता जीते-जी उसके प्राण हरती है। बड़े-बड़े लोग … Read more

कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है

राधा गोयलनई दिल्ली****************************************** ज़िंदगी ने कदम-कदम पर इम्तिहान लिया। इतने कठिन इम्तिहान लिए, कि आज सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है कि किस तरह से उन सब पर विजय प्राप्त की। कदम-कदम पर चुनौतियाँ आईं।    एक ऐसी लड़की… जिसके मायके में हर तरह की सुविधाएँ थीं… खाने-पीने की कोई तंगी नहीं थी। बहुत बड़ा … Read more

ताप कहूँ या सूर्यदेव संताप!

आचार्य संजय सिंह ‘चन्दन’धनबाद (झारखंड )*************************************************** नौ तपा को ताप कहूँ, या सूर्यदेव संताप कहूँभीषण गर्मी, लू कहूँ, या आग-शोला कहूँ! झुलसे सारे पेड़-जंगल, इष्टदेव का खेल अमंगलसूख गए नदी-तालाब, कौन देगा यह जवाब ? नौ तपा की तपिश भीषण, ज्येष्ठ माह मे गर्म व उष्णअजब तेज हो वाष्पीकरण, सीधी पड़े सूरज की किरण। सूर्य रोहनी नक्षत्र के निकट, ताप तपिश हो भारी विकटलू, … Read more

एक नारी का क्या दोष ?

ममता सिंहधनबाद (झारखंड)***************************************** सोलह श्रृंगार नहीं तो क्या वो एक इंसान नहीं,बाकी सभी पहचान अब किसी काम की नहीं। औरों की नजरों में क्या उसे मर जाना चाहिए,बच्चों को दूसरों के हवाले कर जाना चाहिए! वही बच्चे जब दूसरों पर अब भारी बोझ बनेंगे,“हमारे नहीं हैं” कहकर पल्ला झाड़ ही लेंगे। इंसानों को बनाया है … Read more

“…तुमने उसे बचाया क्यों नहीं ?”

बबिता कुमावतसीकर (राजस्थान)***************************************** मेरा पर्यावरण, मेरी जान (विश्व पर्यावरण दिवस)… एक समय के बाद,धीरे-धीरे थकने लगती है पृथ्वी भीनदियाँअपनी पारदर्शी स्मृतियाँ खोने लगती हैं, पहाड़ों की छाती परखनन के गहरे घाव उभर आते हैंऔर जंगल,जो कभी पक्षियों की भाषा में साँस लेते थेमशीनों के शोर में,अपनी हरियाली भूलने लगते हैं।  हमने विकास के नाम पर,बहुत कुछ … Read more

कहती वसुधा 

दीप्ति खरेमंडला (मध्यप्रदेश)************************************* मेरा पर्यावरण, मेरी जान (विश्व पर्यावरण दिवस विशेष)… करती है वसुधा पुकार,मत करो मेरा आवरण तार तार। ताल तलैया सागर नदिया,यह हैं मेरे सुंदर गहनेमत करो नष्ट इनको तुम सब,विनती है मेरी बारम्बार।करती है वसुधा पुकार,मत करो मेरा आवरण तार-तार…॥ झाड़-पेड़, पर्वत और टीले,यह सब हैं मेरी संताननष्ट करो ना स्वार्थ की … Read more

माता-पिता सबसे महान

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’सोलन (हिमाचल प्रदेश)***************************************************** हमारा भविष्य, ताकत और प्रेरणा (विश्व माता-पिता दिवस विशेष)…. माता-पिता से ही,हमारी पहिचान हैमाता-पिता भगवान,से भी महान हैं। माता-पिता ही हमारा,भविष्य बनाते हैंखुद भूखे रह कर भी,हमें खिलाते हैं। माता-पिता भगवान के,प्रतिनिधि बनकर आते हैंऔर हमारा जीवन,अच्छे से सवांरते हैं। माता-पिता का अहसान,हम कभी नहीं चुका पाएँगेएक जन्म क्या … Read more

मेरे भगवान

संजय एम. वासनिकमुम्बई (महाराष्ट्र)************************************* हमारा भविष्य, ताकत और प्रेरणा (विश्व माता-पिता दिवस विशेष)… माँ की लोरी में नींद है, पिता की डाँट में प्यार हैमेरे सारे सवालों का,बस यही संसार है।   न मंदिर गया कभी, न मस्जिद गया कभीन गुरुद्वारे में मत्था टेका कभी,न कोई तीर्थ पर गया कभीजिस आँगन में वो हैं, बस वही मेरा खुदा … Read more

हम वह अंतिम पीढ़ी हैं..

राजू महतो ‘राजूराज झारखण्डी’धनबाद (झारखण्ड) ********************************************* प्राचीनता में पले-बढ़े,आधुनिकता के रंगों में रंगेहम वह बीच की कड़ी हैं,दोनों को जिसने देखा-समझा,हम वह अंतिम पीढ़ी हैं। हमने डिबिया लालटेन देखा,साइकिल का कमाल देखापाँच-दस पैसे का धमाल देखा,आज फ्रिज का पानी पीने वालेकल मटके का भी कमाल देखा। गुरु को भगवान समझने वाले,शिक्षा का होते व्यापार देखाप्राचीन रीति-रिवाज … Read more

संगोष्ठी : हिंदी नवजागरण और ‘उदन्त मार्तण्ड’ पर हुआ मंथन

hindi-bhashaa

कोलकाता (पश्चिम बंगाल) | कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज एवं भारतीय हिंदी प्राध्यापक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में ‘हिंदी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के विकास में पत्रकारिता का योगदान’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। अध्यक्षता प्रो. मोहन ने की।  संगोष्ठी में प्रो. विनोद कुमार मिश्र, डॉ. प्रेमशंकर, राज मिठौलिया, प्रो. सत्या उपाध्याय एवं प्रो. संजीव … Read more