सफ़र में अकेले चलना
दीप्ति खरेमंडला (मध्यप्रदेश)************************************* चल पड़ी हूँ जीवन की,अनजान राहों पर अकेली।पर कभी कभी ये सफ़र,दिल को रुला जाता है। जीवन की इन राहों पर,भीड़ है चलने वालों कीपर भीड़ भरी इन राहों पर भी,मन तन्हा रह जाता है। साथ हो हमसफ़र लेकिन,साथ का एहसास न हो।बातें होती हों रोज मगर,दिल की बातें दिल में रह … Read more