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कर्तव्य

डॉ.विद्यासागर कापड़ी ‘सागर’
पिथौरागढ़(उत्तराखण्ड)
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कर्तव्य पथ पर चल पड़ा जो,
आँधियों से कब डरा है।
पथ में असीमित शैल होंगे,
उर सदा माधव भरा है॥

मधु हास भरकर बाँह अपनी,
मंजिलें नित खोलती हैं।
शूलों हटो तुम राह से ये,
पाँखुड़ी ही बोलती हैं॥

यूँ देख उसके साहसों को,
यामिनी छुपती विभा में।
उसकी विजय के गीत बजते,
सदा गुणियों की सभा में॥

पराभव ने ही विजय का भी,
ताज उसके सिर धरा है।
पथ में असीमित शैल होंगे,
उर सदा माधव भरा है…॥

कर्तव्य को जो मनु सदा ही,
किसन का उपदेश माने।
नित संकटों के घोर घन को,
वो विजय के केश माने॥

दुर्बोध पथ का साथ भी हो,
सपन कब रहते अधूरे।
यूँ देख उसका श्रमसीकर,
विबुध करते सपन पूरे॥

धारायें प्रतिकूल हों तो,
वो सहज होकर तरा है।
पथ में असीमित शैल होंगे,
उर सदा माधव भरा है…॥

वो धीर दु:ख में मुस्कुराने,
की कलायें जानता है।
है शुभ विजय मेरे निकट ही,
वो सदा ये मानता है॥

दिखे रिपु उर में रिपु न केवल,
देखता है मीत को भी।
नित हार में घुलकर मिली वो,
देख लेता जीत को भी॥

उर शुभ्र निर्मल सुरसरी-सा,
सुख व दु:ख में नित खरा है।
पथ में असीमित शैल होंगे,
उर सदा माधव भरा है…॥

कर्तव्य पथ पर चल पड़ा जो,
आँधियों से कब डरा है।
पथ में असीमित शैल होंगे,
उर सदा माधव भरा है…॥

परिचय-डॉ.विद्यासागर कापड़ी का सहित्यिक उपमान-सागर है। जन्म तारीख २४ अप्रैल १९६६ और जन्म स्थान-ग्राम सतगढ़ है। वर्तमान और स्थाई पता-जिला पिथौरागढ़ है। हिन्दी और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले उत्तराखण्ड राज्य के वासी डॉ.कापड़ी की शिक्षा-स्नातक(पशु चिकित्सा विज्ञान)और कार्य क्षेत्र-पिथौरागढ़ (मुख्य पशु चिकित्साधिकारी)है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत पर्वतीय क्षेत्र से पलायन करते युवाओं को पशुपालन से जोड़ना और उत्तरांचल का उत्थान करना,पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं के समाधान तलाशना तथा वृक्षारोपण की ओर जागरूक करना है। आपकी लेखन विधा-गीत,दोहे है। काव्य संग्रह ‘शिलादूत‘ का विमोचन हो चुका है। सागर की लेखनी का उद्देश्य-मन के भाव से स्वयं लेखनी को स्फूर्त कर शब्द उकेरना है। आपके पसंदीदा हिन्दी लेखक-सुमित्रानन्दन पंत एवं महादेवी वर्मा तो प्रेरणा पुंज-जन्मदाता माँ श्रीमती भागीरथी देवी हैं। आपकी विशेषज्ञता-गीत एवं दोहा लेखन है।

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