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‘जलीकट्टू’ से ‘आस्कर’ की बड़ी आस

इदरीस खत्री
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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मलयालम फ़िल्म ‘जलीकट्टू’ को ऑस्कर में भेजने के लिए आधिकारिक घोषणा हो चुकी है।
‘जलीकट्टू’ केरल की मलयालम भाषी फ़िल्म है। हर साल भारत से एक फ़िल्म ऑस्कर में भेजते हैं,श्रेणी होती है सर्वश्रेष्ठ अंतराष्ट्रीय विदेशी भाषीय फ़िल्म। भारत में कुल २६ फिल्में कतार में थी,जिसमें- ‘सीरियस मेन,छपाक,शकुंतला देवी,गुंजन सक्सेना, बुलबुल’ आदि,लेकिन अंतिम चयन हुआ ‘जलीकट्टू’ का,जो ९३वे एकेडमी ऑस्कर पुरस्कार में भारत का प्रतिनिधित्व करेगी।
अब फिल्म पर आते हैं तो ‘जलीकट्टू’ २०१९ में प्रदर्शित हुई थी। केरल के एक गाँव में एक भैंसा सनकी हो चला है,जिसका गाँव वाले वध करना चाहते हैं,लेकिन अंत में आपको समझ पड़ेगी कि जानवर भैंसा सनकी नहीं हुआ था,बल्कि इंसान रुपी जानवर सनकी हुआ था। यही फ़िल्म का मूल सन्देश है,जो इसे ऑस्कर की दौड़ में खड़ा करता है।
फ़िल्म को देखना शुरू करते हैं तो खुद को और फ़िल्म को रोक नहीं सकते हैं। संगीत शानदार है। प्रशांत पिल्लई ने हर दृश्य पर संगीत माकूल और लाजवाब बनाया है।
सहयोगी कलाकारों ने किरदारों के साथ कुछ ऐसा न्याय किया है कि,फ़िल्म के असली नायक लगने लगते हैं।
फिल्मांकन-
लंबे-लंबे दृश्य एक ही चरण में निकाल दिए गए हैं, जो गिरीश गंगाधरन का जादू ही कहा जाएगा। फ़िल्म देखते समय हमें ऐसा आभास होने लगता है कि,किसी घटना का सीधा चित्रण चल रहा है तो यह कैमरामैन की कामयाबी मानी जाएगी। भीड़-भाड़ वाले दृश्यों की सटीकता भी दिल तक पहुँच जाती है। एक दृश्य में गाँव वालों को टॉर्च हाथ में लिए शिकार कर रहे पूरा देखना एक नया अनुभव देता है,क्योंकि यह दृश्य मुश्किल और कठिन है।
अभिनय-निर्देशन-
कलाकारों में सभी ने दिल जीत लिया है। खास तौर पर शांति,अंटोनी,सबुमोंन,जाफर शानदार लगे हैं। सँवाद और कहानी एस. हरीश ने इतने सुंदर बुने हैं कि आप कोई भी दृश्य छोड़ना नहीं चाहेंगे। एल.जे. पेलिसरी का निर्देशन भी उम्दा है,जो फ़िल्म को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ले जाता है।
फ़िल्म में पुरस्कार जीतने की सारी खूबियां हैं, लेकिन अंतराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा भी समझना पड़ेगी। फिर भी फ़िल्म के सभी तकनीकी पहलू जैसे फिल्मांकन,कलाकार,मूल परिकल्पना,संगीत, निर्देशन और सामाजिक सन्देश आदि सभी में फ़िल्म उम्दा और शानदार है। यह फ़िल्म आस्कर लाने की सभी खूबियां रखती है। एक टीस सी है मन में कि,भारतीय फिल्मों के हाथों में आस्कर ज्यादा नहीं पहुँच पाया तो क्या हम अंतराष्ट्रीय सिनेमा में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाए या खुद को साबित नहीं कर पाए हैं..,परन्तु इस बार यह अकाल ‘जलीकट्टू’ पर खत्म होता दिख रहा है।

परिचय : इंदौर शहर के अभिनय जगत में १९९३ से सतत रंगकर्म में इदरीस खत्री सक्रिय हैं,इसलिए किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। परिचय यही है कि,इन्होंने लगभग १३० नाटक और १००० से ज्यादा शो में काम किया है। देअविवि के नाट्य दल को बतौर निर्देशक ११ बार राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व नाट्य निर्देशक के रूप में देने के साथ ही लगभग ३५ कार्यशालाएं,१० लघु फिल्म और ३ हिन्दी फीचर फिल्म भी इनके खाते में है। आपने एलएलएम सहित एमबीए भी किया है। आप इसी शहर में ही रहकर अभिनय अकादमी संचालित करते हैं,जहाँ प्रशिक्षण देते हैं। करीब दस साल से एक नाट्य समूह में मुम्बई,गोवा और इंदौर में अभिनय अकादमी में लगातार अभिनय प्रशिक्षण दे रहे श्री खत्री धारावाहिकों और फिल्म लेखन में सतत कार्यरत हैं। फिलहाल श्री खत्री मुम्बई के एक प्रोडक्शन हाउस में अभिनय प्रशिक्षक हैंL आप टीवी धारावाहिकों तथा फ़िल्म लेखन में सक्रिय हैंL १९ लघु फिल्मों में अभिनय कर चुके श्री खत्री का निवास इसी शहर में हैL आप वर्तमान में एक दैनिक समाचार-पत्र एवं पोर्टल में फ़िल्म सम्पादक के रूप में कार्यरत हैंL